sn vyas
🙏🙏🛐ॐ श्री परमात्मने नमः🛐🙏🙏
🙏कर्म का सिद्धांत पुस्तक से 🙏
#भाग_१८
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🥰 किंतु कोई कर्म ही न करें तो ?🥰
*कोई बहस करें कि मैं इस जीवनकाल दौरान कोई कर्म ही न करूं , तो फिर संचित कर्म जमा होने का सवाल ही रहता नहीं , और उसको पक कर प्रारब्ध रूप से भोगने का प्रश्न भी रहे नहीं,, और वह भोगने के लिए देह धारण करना पड़े नहीं ,,,, अतः अपने आप मोक्ष हो सकता है और देह से मुक्त भी हो सकते हैं।*
*यह दलील ठीक नहीं है। आदमी कर्म किए बिना तो रह ही नहीं सकता।*
*भगवान गीता में स्पष्ट कहते हैं कि--*
*नहि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठति अकर्मकृत्।*
*शरीरयात्राऽपि च ते न प्रसिध्येत् अकर्मण:॥*
*कोई भी आदमी एक क्षण भी कर्म किए बिना रह सकता नहीं । वह कर्म न करे तो उसके शरीर यात्रा ठहर जाएगी।*
*स्नान करना , धोना, खाना-पीना , उठना , बैठना, बोलना , सोना , निद्रा में होना, देखना , श्वास लेना , जीवन निर्वाह के लिए, नौकरी धंधा करना , शरीर स्वस्थ के लिए कसरत , आदि कार्य करने ही पड़ते हैं । इसके लिए कर्म तो जन्म से मरण तक करने ही पड़ेंगे ।*
*किंतु क्रियमाण कर्म करने में उसे ऐसी कुशलतापूर्वक कर्म करने चाहिए , कि जिससे वह कर्म तत्कालिक फल देकर शांत हो जाए और वह संचित कर्मों में जमा नहीं होने पावे।*
*तब ही उन कर्मों को लंबे समय के पश्चात भविष्य में प्रारब्ध रूप से भोगने के लिए दूसरा शरीर धारण न करना पड़े । इसके लिए आदमी को ऐसे क्रियमाण करना चाहिए कि जिससे वे संचित में जमा हो ही नहीं पावे।*
क्रमश ✍🏽
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