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#❤️जीवन की सीख #🙏 प्रेरणादायक विचार #🙏गीता ज्ञान🛕 #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #गीता
❤️जीवन की सीख - एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फ्लानि च। कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम्।। इसलिये हे पार्थ! इन यज्ञ, दान और तपरूप कर्मोको तथा और भी सम्पूर्ण कर्तव्यकर्मोंको आसक्ति और फलौंका त्याग करके अवश्य करना चाहिये; यह मेरा निश्चय किया हुआ उत्तम मत है Il ६ ।l नियतस्य तु सन्यासः कर्मणो नोपपद्यते मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकोर्तितः Il ( निपिद्ध कर्मोका T और स्वरूपसे काम्य त्याग करना उचित ही है) परन्तु नियत कर्मका * स्वरूपसे करना उचित नहीं है। इसलिये त्याग मोहके कारण उसका त्याग कर देना নাসম त्याग எ 7 8Il0 II दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत् | 7d स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं जो कुछ कर्म है, वह सब दुःखरूप हीं है= 9ITfa   aౌTగ यदि कोई समझकर कर्तव्यकर्मोंका त्याग कर दे, तो वह ऐसा राजस त्याग करकेत्यागके फलको किसो प्रकार भौ नहों पाता II ८ II कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेर्जुन सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः  हे अर्जुन ! जो शास्त्रविहित कर्म करना कर्तव्य है= इसी भावसे आसक्ति और फलका त्याग करके किया जाता है॰ वही सात्त्विक त्याग माना गया है II ९ ।l  इसो ४८ को रिप्पणीमें எ 34 সাযন্ধ श्लाक देखना चाहिये। श्रीमढ्भगवढ्गीता अध्याय १८ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फ्लानि च। कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम्।। इसलिये हे पार्थ! इन यज्ञ, दान और तपरूप कर्मोको तथा और भी सम्पूर्ण कर्तव्यकर्मोंको आसक्ति और फलौंका त्याग करके अवश्य करना चाहिये; यह मेरा निश्चय किया हुआ उत्तम मत है Il ६ ।l नियतस्य तु सन्यासः कर्मणो नोपपद्यते मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकोर्तितः Il ( निपिद्ध कर्मोका T और स्वरूपसे काम्य त्याग करना उचित ही है) परन्तु नियत कर्मका * स्वरूपसे करना उचित नहीं है। इसलिये त्याग मोहके कारण उसका त्याग कर देना নাসম त्याग எ 7 8Il0 II दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत् | 7d स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं जो कुछ कर्म है, वह सब दुःखरूप हीं है= 9ITfa   aౌTగ यदि कोई समझकर कर्तव्यकर्मोंका त्याग कर दे, तो वह ऐसा राजस त्याग करकेत्यागके फलको किसो प्रकार भौ नहों पाता II ८ II कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेर्जुन सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः  हे अर्जुन ! जो शास्त्रविहित कर्म करना कर्तव्य है= इसी भावसे आसक्ति और फलका त्याग करके किया जाता है॰ वही सात्त्विक त्याग माना गया है II ९ ।l  इसो ४८ को रिप्पणीमें எ 34 সাযন্ধ श्लाक देखना चाहिये। श्रीमढ्भगवढ्गीता अध्याय १८ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार - ShareChat