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#पूजन विधि
पूजन विधि - शुक्र प्रदोष व्रत कथा धनिक पुत्र द्वारा शुक्रास्त में पत्नी को विदा कराने की कथा  নীল "प्राचीन काल की एक नगर में तीन मित्र निवास करते थे। तीनों নান ஈளி मित्रों के मध्य अत्यन्त घनिष्ठता थी। उन मित्रों में एक राजकुमार , दूसरा ब्राह्मण पुत्र तथा राजकुमार एवं ब्राह्मण पुत्र का विवाह हो चुका था तथा तीसरा एक धनिक का पुत्र था गौना नहीं हुआ " धनिक पुत्र का विवाह तो हो गया था किन्तु / एक दिन तीनों मित्रों के मध्य स्त्रियों के विषय में चर्चा हो रही थी ब्राह्मण पुत्र स्त्रियों प्रशंसा करते हुये बोला  'स्त्री ही भवन को घर बनाती है तथा स्त्रीहीन घर तो भूतों निवास होता है । धनिक पुत्र को ब्राह्मण पुत्र के वचन उचित लगे तथा उसने तत्काल l उसने घर पहुँचकर माता-पिता ही अपनी पत्नी को विदा कराकर लाने का निश्चय किया 'वर्तमान में शुक्र देवता अस्त को भी अपना निर्णय बताया उसके माता-पिता ने कहा #48- चल रहे हैं, इस समयावधि -बेटियों को विदा कराकर लाना शुभ नहीं होता है, शुक्र उदय होने के उपरान्त तुम अपनी पत्नी को विदा करा लाना अतः अपना हठ नहीं छोड़़ा तथा अपनी माता-पिता द्वारा बहुत समझाने पर भी धनिक पुत्र ने ससुराल में उसके सास-ससुर ने भी शुक्रोदय होने के पत्नी को लेने ससुराल पहुँच गया का निवेदन किया किन्तु उसने किसी की भी बात नहीं पश्चात् पुत्री की विदाई কনে मानी और अपने निर्णय पर अडिग रहा अन्ततः अपने दामाद के हठ से विवश होकर अपनी कन्या को उसके साथ विदा कर दिया उन्ह  ससुराल से विदा होकर वे दोनों पति-पत्नी नगर की सीमा से कुछ दूर ही निकले थे कि अकस्मात् ही उनकी बैलगाड़ी का पहिया टूट गया तथा एक बैल की टाँग टूट गयी | इस दुर्घटना के कारण वे दोनों नीचे गिर गये तथा उसकी पत्नी भी गम्भीर रूप से घायल हो इस दुर्घटना के पश्चात् भी वह धनिक पुत्र अपनी पत्नी सहित यात्रा करता रहा गयी अभी कुछ में डाकुओं के एक दल ने उन्हें घेरकर ओर आगे बढ़ा ही था कि मार्ग 6 लूटपाट हो जाने के उपरान्त धनिक का पुत्र उनका समस्त धन-्धान्य आदि लूट लिया पत्नी सहित विलाप करता हुआ अपने घर पहुँचा | ज्यों ही वह घर पहुँचा , वहाँ उसे एक उसके पिता ने अपने पुत्र के उपचार हेतु श्रेष्ठ वैद्यों को बुलाया | वैद्यों सर्प ने डस लिया ने उसके पुत्र की स्थिति का अवलोकन किया तथा बोले 'आगामी तीन दिवस में उसकी मृत्यु हो जायेगी । उसी समय इस घटना की सूचना ब्राह्मण पुत्र को प्राप्त हुयी | उसने धनिक से कहा  घर वापस भेज दीजिये तथा शुक्र प्रदोष के 'आप अपने लड़के को पत्नी सहित बहू के व्रत का सङ्कल्प लीजिये। यह सारी बाधायें इसीलिये उत्पन्न हुयी हैं क्योंकि आपका पुत्र शुक्रास्त में अपनी पत्नी को विदा कराकर लाया है, यदि यह वहाँ पहुँच गया तो इसके प्राण बच जायेंगे ।' धनिक को ब्राह्मण पुत्र का परामर्श उचित लगा तथा उसने अपने पुत्र एवं पुत्रवधू को वापस लौटा दिया ससुराल पहुँचते ही धनिक के पुत्र की स्थिति में सुधार होने लगा की कृपा से दोनों पति-्पत्नी ने शेष जीवन सुख एवं तदुपरान्त भगवान शिव आनन्दपूर्वक व्यतीत किया तथा अन्त में उत्तम लोक को प्राप्त हुये ।" शुक्रवार त्रयोदशी प्रदोष व्रत की पूजा विधि सोम प्रदोष के समान ही है, इस व्रत में श्वेत रंग तथा खीर आदि पदार्थों का सेवन किया जाता है ।।इति श्री शक्र प्रदोष व्रत कथा सम्पर्णः I।I शुक्र प्रदोष व्रत कथा धनिक पुत्र द्वारा शुक्रास्त में पत्नी को विदा कराने की कथा  নীল "प्राचीन काल की एक नगर में तीन मित्र निवास करते थे। तीनों নান ஈளி मित्रों के मध्य अत्यन्त घनिष्ठता थी। उन मित्रों में एक राजकुमार , दूसरा ब्राह्मण पुत्र तथा राजकुमार एवं ब्राह्मण पुत्र का विवाह हो चुका था तथा तीसरा एक धनिक का पुत्र था गौना नहीं हुआ " धनिक पुत्र का विवाह तो हो गया था किन्तु / एक दिन तीनों मित्रों के मध्य स्त्रियों के विषय में चर्चा हो रही थी ब्राह्मण पुत्र स्त्रियों प्रशंसा करते हुये बोला  'स्त्री ही भवन को घर बनाती है तथा स्त्रीहीन घर तो भूतों निवास होता है । धनिक पुत्र को ब्राह्मण पुत्र के वचन उचित लगे तथा उसने तत्काल l उसने घर पहुँचकर माता-पिता ही अपनी पत्नी को विदा कराकर लाने का निश्चय किया 'वर्तमान में शुक्र देवता अस्त को भी अपना निर्णय बताया उसके माता-पिता ने कहा #48- चल रहे हैं, इस समयावधि -बेटियों को विदा कराकर लाना शुभ नहीं होता है, शुक्र उदय होने के उपरान्त तुम अपनी पत्नी को विदा करा लाना अतः अपना हठ नहीं छोड़़ा तथा अपनी माता-पिता द्वारा बहुत समझाने पर भी धनिक पुत्र ने ससुराल में उसके सास-ससुर ने भी शुक्रोदय होने के पत्नी को लेने ससुराल पहुँच गया का निवेदन किया किन्तु उसने किसी की भी बात नहीं पश्चात् पुत्री की विदाई কনে मानी और अपने निर्णय पर अडिग रहा अन्ततः अपने दामाद के हठ से विवश होकर अपनी कन्या को उसके साथ विदा कर दिया उन्ह  ससुराल से विदा होकर वे दोनों पति-पत्नी नगर की सीमा से कुछ दूर ही निकले थे कि अकस्मात् ही उनकी बैलगाड़ी का पहिया टूट गया तथा एक बैल की टाँग टूट गयी | इस दुर्घटना के कारण वे दोनों नीचे गिर गये तथा उसकी पत्नी भी गम्भीर रूप से घायल हो इस दुर्घटना के पश्चात् भी वह धनिक पुत्र अपनी पत्नी सहित यात्रा करता रहा गयी अभी कुछ में डाकुओं के एक दल ने उन्हें घेरकर ओर आगे बढ़ा ही था कि मार्ग 6 लूटपाट हो जाने के उपरान्त धनिक का पुत्र उनका समस्त धन-्धान्य आदि लूट लिया पत्नी सहित विलाप करता हुआ अपने घर पहुँचा | ज्यों ही वह घर पहुँचा , वहाँ उसे एक उसके पिता ने अपने पुत्र के उपचार हेतु श्रेष्ठ वैद्यों को बुलाया | वैद्यों सर्प ने डस लिया ने उसके पुत्र की स्थिति का अवलोकन किया तथा बोले 'आगामी तीन दिवस में उसकी मृत्यु हो जायेगी । उसी समय इस घटना की सूचना ब्राह्मण पुत्र को प्राप्त हुयी | उसने धनिक से कहा  घर वापस भेज दीजिये तथा शुक्र प्रदोष के 'आप अपने लड़के को पत्नी सहित बहू के व्रत का सङ्कल्प लीजिये। यह सारी बाधायें इसीलिये उत्पन्न हुयी हैं क्योंकि आपका पुत्र शुक्रास्त में अपनी पत्नी को विदा कराकर लाया है, यदि यह वहाँ पहुँच गया तो इसके प्राण बच जायेंगे ।' धनिक को ब्राह्मण पुत्र का परामर्श उचित लगा तथा उसने अपने पुत्र एवं पुत्रवधू को वापस लौटा दिया ससुराल पहुँचते ही धनिक के पुत्र की स्थिति में सुधार होने लगा की कृपा से दोनों पति-्पत्नी ने शेष जीवन सुख एवं तदुपरान्त भगवान शिव आनन्दपूर्वक व्यतीत किया तथा अन्त में उत्तम लोक को प्राप्त हुये ।" शुक्रवार त्रयोदशी प्रदोष व्रत की पूजा विधि सोम प्रदोष के समान ही है, इस व्रत में श्वेत रंग तथा खीर आदि पदार्थों का सेवन किया जाता है ।।इति श्री शक्र प्रदोष व्रत कथा सम्पर्णः I।I - ShareChat