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#पौराणिक कथा क्या आप जानते हैं कि एक चींटी 72 बार स्वर्ग की राजा (इंद्र) बन चुकी है? पुराणों की यह अद्भुत कथा बड़े से बड़े अहंकार को पल भर में चकनाचूर कर देती है। बात उस समय की है जब देवराज इंद्र ने वृत्रासुर का वध किया था। तीनों लोकों में उनकी जय-जयकार हो रही थी। इस जीत के अहंकार में इंद्र ने विश्वकर्मा जी को बुलाकर कहा, "मेरे लिए एक ऐसा भव्य महल बनाओ, जैसा आज तक किसी ने न बनवाया हो!" महल बन गया—सोने के कंगूरे, हीरों के झरोखे। लेकिन इंद्र का मन नहीं भरा, वे बार-बार उसे और बड़ा करने का आदेश देते रहे। थक हारकर विश्वकर्मा जी भगवान विष्णु की शरण में गए। विष्णु जी मुस्कुराए और बोले— "अहंकार का इलाज हथौड़े से नहीं, आईने से होता है।" अगले दिन इंद्र के दरबार में एक 10 वर्षीय बालक (स्वयं भगवान विष्णु) नंगे पाँव पहुँचा। जब इंद्र ने पूछा कि तुम कौन हो, तो बालक ने उत्तर दिया: "मैं वही हूँ जो तब आता है, जब कोई राजा स्वयं को भगवान समझने लगता है।" इंद्र को क्रोध आया, पर तभी बालक ने फर्श पर चलती काली-भूरी चींटियों की एक लंबी कतार की ओर इशारा करते हुए पूछा, "क्या तुम गिन सकते हो कि इनमें से कितनी चींटियाँ पहले इंद्र बन चुकी हैं?" उसी समय रोम-रोम वाले लोमश ऋषि सभा में पधारे। उन्होंने एक चींटी को उंगली पर उठाया और इंद्र से कहा: "इसे देखो। यह आज एक चींटी है, पर यह 72 बार स्वर्ग के सिंहासन पर बैठकर 'इंद्र' रह चुकी है!" इंद्र हैरान रह गए। तब विष्णु जी ने उन्हें ब्रह्मांड के समय का चक्र समझाया— ब्रह्मा जी के एक दिन में 14 इंद्र बदल जाते हैं। लोमश ऋषि ने अपनी छाती दिखाते हुए कहा, "मेरा एक बाल एक इंद्र के कार्यकाल (आयु) पूरा होने पर झड़ता है। सोचो, मैं ऐसे कितने इंद्र देख चुका हूँ।" उस चींटी की कहानी और भी हैरान करने वाली थी। पहले कल्प में वह 'सत्यव्रत' नाम का एक राजा था। उसने तप किया और इंद्र का पद पाया। लेकिन सत्ता मिलते ही उसे अमर होने का भ्रम हो गया। उसने यज्ञ बंद करा दिए और ऋषियों का अपमान किया। पुण्य खत्म होते ही वह पद से गिरा। पहले हाथी, फिर शेर, कुत्ता और अंततः अपने घमंड के कारण चींटी बना! फिर कुछ बचे हुए पुण्यों के कारण वह वापस उठा और फिर इंद्र बना। गिरो, 84 लाख योनियों में भटको, फिर पुण्य से उठो... यही संसार का चक्र है। यह सुनकर इंद्र का घमंड टूट गया। चींटियों की वह कतार अब उन्हें अपना 'अतीत' नजर आने लगी। उन्होंने तुरंत विश्वकर्मा जी को बुलाया और कहा: "यह महल तोड़ दो। यह मेरा नहीं है, मैं यहाँ केवल एक किरायेदार हूँ... और किरायेदार घर पर अपना नाम नहीं लिखवाते।" बालक रूपी भगवान विष्णु ने अपना चतुर्भुज रूप दिखाते हुए इंद्र को अंतिम उपदेश दिया: "जब तक तुम 'मैं इंद्र हूँ' कहोगे, तब तक गिरोगे। जिस दिन तुम 'मैं दास हूँ' कहोगे, उसी दिन उठोगे।" सत्ता और पद अस्थायी हैं मित्र कोई भी पद (चाहे वह कितना भी बड़ा क्यों न हो) हमेशा के लिए नहीं होता। अहंकार पतन का कारण है। इंसान अपने पुण्यों और मेहनत से ऊपर उठता है, लेकिन उसका अहंकार उसे वापस ज़मीन पर (या उससे भी नीचे) गिरा देता है। महानता सेवा में है: पद मिलने से आत्मा बड़ी नहीं होती, आत्मा बड़ी होती है सेवाभाव से। जब भी लगे कि आप सबसे ऊपर हैं, ज़मीन पर चलती चींटियों को देख लें। और जब खुद को छोटा समझें, तब भी उन्हें देखें— कर्म और सेवा से एक चींटी भी इंद्र बन सकती है!
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