#राधे-राधे
' आत्मा और परमात्मा का सम्बन्ध '
आत्मा और परमात्मा का सम्बन्ध कोई नया या अस्थायी सम्बन्ध नहीं है। यह अनादि, नित्य और शाश्वत है। जिस प्रकार सूर्य और उसकी किरणों का, अग्नि और उसकी ज्वाला का, समुद्र और उसकी तरंगों का सम्बन्ध होता है, उसी प्रकार जीवात्मा और परमात्मा का सम्बन्ध है।
भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं कहा है...
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति॥
इस संसार में स्थित सभी जीव मेरे ही सनातन अंश हैं।
अर्थात् जीव कोई पृथक सत्ता नहीं है, वह परमात्मा का अंश है। अंश और अंशी का सम्बन्ध कभी समाप्त नहीं होता।
परमात्मा प्रत्येक आत्मा के हृदय में स्थित हैं।
श्रीकृष्ण कहते हैं...
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया॥
परमात्मा प्रत्येक जीव के हृदय में अन्तर्यामी रूप से विराजमान हैं। वे हमारे सबसे निकट हैं—इतने निकट कि हमारी प्रत्येक भावना, प्रत्येक विचार और प्रत्येक प्रार्थना को जानते हैं।
आत्मा परमात्मा की ओर स्वाभाविक रूप से आकर्षित होती है।
जैसे नदी का स्वभाव समुद्र की ओर बहना है, वैसे ही आत्मा का स्वभाव परमात्मा की ओर आकर्षित होना है। संसार की वस्तुओं में सुख खोजते-खोजते जब आत्मा थक जाती है, तब वह अपने वास्तविक आश्रय परमात्मा की ओर लौटती है।
नित्योनित्यानां चेतनश्चेतनानाम्
एको बहूनां यो विदधाति कामान्।
(श्वेताश्वतर उपनिषद् 6.13)
अनेक नित्य और चेतन जीवों में एक परम नित्य और परम चेतन भगवान हैं, जो सबकी आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं।
आत्मा का वास्तविक धर्म – प्रेम....
आत्मा का स्वरूप केवल अस्तित्व नहीं, बल्कि प्रेम है। इसलिए संसार के समस्त सम्बन्ध अपूर्ण लगते हैं, क्योंकि आत्मा पूर्ण प्रेम की खोज में रहती है और वह पूर्ण प्रेम केवल परमात्मा में ही उपलब्ध है।
स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे।
अहैतुक्यप्रतिहता ययात्मा सुप्रसीदति॥
मनुष्य का सर्वोच्च धर्म वह है जिससे भगवान के प्रति निष्काम और निरन्तर भक्ति उत्पन्न हो; उसी से आत्मा को वास्तविक शान्ति प्राप्त होती है।
दो पक्षियों का अद्भुत उदाहरण...
उपनिषदों में आत्मा और परमात्मा के सम्बन्ध को दो पक्षियों द्वारा समझाया गया है।
द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते।
एक ही वृक्ष पर दो मित्र पक्षी बैठे हैं। एक पक्षी (जीवात्मा) कर्मफलों का भोग करता है, जबकि दूसरा पक्षी (परमात्मा) साक्षी बनकर देखता रहता है और अवसर आने पर जीव का मार्गदर्शन करता है।
अत:
आत्मा और परमात्मा का सम्बन्ध स्वामी और सेवक का, पिता और पुत्र का, मित्र और सखा का, तथा प्रेमी और प्रियतम का है। आत्मा जब संसार की अस्थायी आसक्तियों को छोड़कर परमात्मा की शरण ग्रहण करती है, तब उसका वास्तविक जीवन प्रारम्भ होता है।
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥
जब आत्मा परमात्मा की शरण में पहुँच जाती है, तब उसका भटकाव समाप्त हो जाता है। तब वह अनुभव करती है कि जिसे वह जन्मों से बाहर खोज रही थी, वह तो उसके हृदय में ही सदैव विराजमान था। आत्मा का परम सौभाग्य परमात्मा से पुनः अपने शाश्वत प्रेम-संबंध को जागृत कर लेना ही है।
॥ राधे राधे ॥
॥ जय श्रीकृष्ण॥
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