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#मेरी कविता #📚कविता-कहानी संग्रह
मेरी कविता - मन का अंतर्द्वंद्व मोसम की बेरुखी का पता पतझड़ से चलता है समुंदर के उफान का पता लहरों से चलता हे पर मन के चिंतन का मनन केसे करें हो कोई नजर तो परख भी करें. जिमीं की प्यास का पता दरारों से चलता है चमन की उदासी का पता दमन से चलता हे पर रूह की तड़प का हिसाब केसे करें हो कोई तराजू तो तोल भी करें. शब की खामोशी का पता सवेरे से चलता हे दिये की जिंदगी का पता अंधेरे से चलता हे पर अंतर्मन के शोरको शांत केसे करें हो कोई धीर पवन तो विश्राम भी करें..!! कांच के टूटने का पता खनक से चलता हैे राही की थकान का पता कदम से चलता हे पर जज्बातों के सैलाब को काबू केसे करें हो कोई किनारा तो ठहराव भी करें. सब देख लिया इस जग ने बाहरी सूरत को देखकर पर भीतर के इस दर्पण को साफ़ हम भी केसे करें जब खुद ही मुसाफ़िर ओर खुद ही रास्ता हों तो इस मन के मुकाम को पार केसे करें., स्वाती छीपा मन का अंतर्द्वंद्व मोसम की बेरुखी का पता पतझड़ से चलता है समुंदर के उफान का पता लहरों से चलता हे पर मन के चिंतन का मनन केसे करें हो कोई नजर तो परख भी करें. जिमीं की प्यास का पता दरारों से चलता है चमन की उदासी का पता दमन से चलता हे पर रूह की तड़प का हिसाब केसे करें हो कोई तराजू तो तोल भी करें. शब की खामोशी का पता सवेरे से चलता हे दिये की जिंदगी का पता अंधेरे से चलता हे पर अंतर्मन के शोरको शांत केसे करें हो कोई धीर पवन तो विश्राम भी करें..!! कांच के टूटने का पता खनक से चलता हैे राही की थकान का पता कदम से चलता हे पर जज्बातों के सैलाब को काबू केसे करें हो कोई किनारा तो ठहराव भी करें. सब देख लिया इस जग ने बाहरी सूरत को देखकर पर भीतर के इस दर्पण को साफ़ हम भी केसे करें जब खुद ही मुसाफ़िर ओर खुद ही रास्ता हों तो इस मन के मुकाम को पार केसे करें., स्वाती छीपा - ShareChat