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कलाम बू कलंदर #सूफी काव्य
सूफी काव्य - कलाम अगरचे मोमिनम या बुत परस्तम क़ुबूलम कुन निगारा हर-चे हस्तम (मैं मुसलमान हूँ या बुत परस्त, मैं जो कुछ भी हूँ ऐ महबूब मुझे अपना बना लेI) यके काफ़िर दो-सद बुत मी॰परस्तद मनम मिस्कीं यके रा मी॰परस्तम (एक काफ़िर सैंकड़ों बुतों को पूजता है, मैं तो सिर्फ़ एक बुत को ही पूजता हूँl बुते दारम दरून एनसीनः ए ख़्वेश आँ बुत ब-रोज़ ओ-शब मन रा परस्तम (मेरे सीने में एक बुत है, शब-ओ रोज़ मै उस की ही पूजा करता हूँ ) मरा गोयन्द चरा बुत मी॰परस्ती चू यारम बुत बूवद मन मी॰परस्तम (लोग कहते हैं कि तू बुत परस्ती क्यों करता है, मैं कहता हूँ कि जब मेरा यार बुत हो गया तो मैं भी बुत परस्त बन TTI)  बू शाह कलंदर Motivational Videos App Want कलाम अगरचे मोमिनम या बुत परस्तम क़ुबूलम कुन निगारा हर-चे हस्तम (मैं मुसलमान हूँ या बुत परस्त, मैं जो कुछ भी हूँ ऐ महबूब मुझे अपना बना लेI) यके काफ़िर दो-सद बुत मी॰परस्तद मनम मिस्कीं यके रा मी॰परस्तम (एक काफ़िर सैंकड़ों बुतों को पूजता है, मैं तो सिर्फ़ एक बुत को ही पूजता हूँl बुते दारम दरून एनसीनः ए ख़्वेश आँ बुत ब-रोज़ ओ-शब मन रा परस्तम (मेरे सीने में एक बुत है, शब-ओ रोज़ मै उस की ही पूजा करता हूँ ) मरा गोयन्द चरा बुत मी॰परस्ती चू यारम बुत बूवद मन मी॰परस्तम (लोग कहते हैं कि तू बुत परस्ती क्यों करता है, मैं कहता हूँ कि जब मेरा यार बुत हो गया तो मैं भी बुत परस्त बन TTI)  बू शाह कलंदर Motivational Videos App Want - ShareChat