My Bite
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"स्वप्नदर्शी" ●●●●●●● 🌹🌱🌾 सुंदरता की एक प्रतिमूर्ति, कुछ ऐसे दिल पर छाया है। आसमान से चाँद उतरकर, इस धरा पर जैसे आया है। बनाया होगा जिसने भी तुमको, जैसे कला जगत का कामी है। अर्पण किया हो जैसे सबकुछ ही, वो सुंदरता का जैसे अनुगामी है। बूँद-बूँद अपने हरपल का, स्वभाव स्वरूप ही लुटाया है। स्वर्ग से जैसे माँग देवो से, किसी अप्सरा को जमीन पर लाया है। खोकर अपना सुधबुध सारा, सधे हाथों को जैसे चलाया है। वो शिल्पकार ही अद्भुत है, जिसने इतना सुन्दर तुम्हे बनाया है ।1। चंचल चितवन अनिन्द्य सुंदरी, बेहोश करती नजर कजरारी है। अवाक रहे हर मनुज देख तुम्हे, तिरछी नजर ही इतनी प्यारी है। ओठ तुम्हारे जैसे कली कोंपल, मन में स्वाद मधुरतम भरते हैं। तारतार हर जनजन ही होता, हरमन को ही ये बेकाबू करते हैं। रेशमी कोमल ये बाल तुम्हारे, हरदिल में आह जगाते हैं। नाक गाल कुछ ऐसे दिखते, हरदिल में ही अगन बढ़ाते हैं। दमकता हुआ ये चेहरा तुम्हरा, जैसे दिल में धड़कन की आशा है। अंगप्रत्यंग ही है संगमरमर सा, जैसे खिले गुलाब की ही परिभाषा है ।2। देख तुम्हे दिल थम सा जाए, धड़कन भी चुप सा हो जाए। क्या करे भूल के सबकुछ, सब तुम्हरा ही अनुरागी हो जाए। असाध्य रोग उपजाए सब में, हरमन को ही पागल करते हैं। लूट ले प्रेम से जनजन को, कुछ ऐसे सब आतुर ही रहते है। योगी योग को भूल जाए, वैरागी भी अनुराग करे। ऐ सुंदरी तुम्हरे एकपल को, अचेत होकर भी प्रयास करे। समझ में आए कुछ भी ना, मुँह से कुछ भी बोले ना। बंद कर ले जो हृदय में तो, आँखों को कभी खोले ना ।3। मन पुल्कित हो तन पुल्कित हो, तो उपहास नही कभी होता है। दैव ही जिसे भला वर्णित करे, दिल में अवकाश नही तब होता है। होश न रहता मन में कभी, मन पागल सा होता है। सुंदरता ये चीज ही ऐसी, हरजन को ही पागल करता है। दोष नही है इस दिल का भी, भला अभिमान कहाँ फिर होता है । प्रत्यक्ष खड़ी हो परी सदृश जो, भला तिरस्कार कहाँ कभी होता है। मन सुन्दर हो तन सुन्दर हो, तो दैव ही साथी होता है। मुलभुत तो ये सुंदरता ही है, जिसका हरमन ही अभिलाशी होता है ।4। अहो सुंदरी तनिक देख इधर भी, हमपर भी तनिक उपकार करो। तीर नजर को खिंच हृदय तक,। इस घयल पर तनिक तुम वार करो। ऐ मोहिनी इन घनेरी बादलों को, तनिक इस मुखरे पे भी छाने दो। अपने प्रेम के कुछ बूँद-बूँद कोे, इस हृदय में भी तो समाने दो। हे कामिनी इस पीड़ हृदय को, अपने नयण झील में रहने दो। अपने हृदय के गहन समुन्द्र से, अब कुछ धार प्रेम के बहने दो। मन पुल्कित हो तन पुल्कित हो, कुछ ऐसे भी हमपे आधार धरो। थाम हृदय को हमरा भी........ कुछ अपना भी हमपे आभार करो ।5। अपने प्रेम के नदी धार कोे, कुछ इस प्यासे मन के नाम करो। बरसते अपने प्रेम बूंदों से, इस दिल पर भी सन्धान करो। अहो सुंदरी तनिक देख इधर भी, इस घायल का तनिक उपचार करो। तीर नजर को खिंच हृदय तक, इस घयल पर तनिक तुम वार करो। तीर नजर को खींच हृदय तक...... इस घायल पर तनिक तुम वार करो।।।💕💞 .........✍️रवि प्रताप सिंह("पंकज")🍒 🌳🌳🌳🌳🌳मनमोहन🌳🌳🌳🌳🌳 #🌹प्यार के नगमे💖 #❤️ आई लव यू #💔पुराना प्यार 💔 #💝 शायराना इश्क़ #❤️Love You ज़िंदगी ❤️
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