sn vyas
🙏🙏🛐ॐ श्री परमात्मने नमः🛐🙏🙏
🙏कर्म का सिद्धांत पुस्तक से 🙏
#भाग_४२/४
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गतांक से आगे(विश्राम)
कर्म - भक्ति - ज्ञान योग समन्वय
सृष्टि के लिए कल्याणकारी हो , ईश्वर - प्रीत्यर्थ हो , मेरा भगवान खुश हो , इस भावना से किया गया कर्म , निष्काम कर्म अर्थात भक्ति बन जाता है। निष्काम कर्म अपने आप भक्ति में परिणत हो जाता है।
*ऐसा कर्मयोगी भक्त इंद्रियों से विषयों द्वारा सांसारिक पदार्थों का भोग करता हो , तो उसकी भोग करने की क्रिया भी परमात्मा का पूजा बन जाती है।*
*ऐसा निष्काम कर्मयोगी भक्त निद्राधीन हो तो उसकी निद्राधीन क्रिया भी समाधि बन जाती है।*
*ऐसा निष्काम कर्मयोगी भक्त अपने सांसारिक कर्म करने के लिए गांव में , आफिस में, बाजार में या चमन में कहीं भी घूमता हो , उसकी चलने की वह क्रिया भी परमात्मा की प्रदक्षिणा - परिक्रमा बन जाती है ।*
*ऐसा निष्काम कर्म योगी भक्त अपनी पत्नी , बच्चे , सगे संबंधियों के साथ बातचीत करता हो तो उसकी वाणी भी परमात्मा का स्रोत बन जाती है।*
*इस प्रकार निष्काम कर्म योगी का प्रत्येक कर्म भक्ति बन जाता है । वह भक्ति इतनी उच्च कोटि की विशुद्ध होती है कि उस पर अपने आप ज्ञान का प्रकाश पड़ता है।*
*इस प्रकार कर्म, भक्ति और ज्ञान का पवित्र त्रिवेणी संगम हो जाए तो ही , अंतकरण का पट शुद्ध होता है और उसमें ब्रह्म का प्रतिबिंब पड़ता है, तथा आत्म साक्षात्कार होता है।*
*भक्तिहीन कर्म मिथ्याचार बन जाता है और भक्ति हीन ज्ञान भी निरर्थक होता है । कर्म और ज्ञान दोनों भक्ति से ओतप्रोत न हो तो निरर्थक होते हैं।*
क्रमश: ✍🏽
#कर्म #कर्म ही पूजा है #श्रीमद्भागवत गीता के श्लोक ॐ #🙏श्रीमद्भागवत गीता📙 #🙏💐श्रीमद्भागवत गीता💐🙏 bhagwat geeta