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#ऐसा प्रभाव भर दे, मेरे अधीर मन में॥
ऐसा प्रभाव भर दे, मेरे अधीर मन में॥ - मैं ढूँढता तुझे था, जब कुंज और वन में। तू खोजता मुझे था, तब दीन के सदन में Il तू 'आहे' बन किसी की, मुझको पुकारता था। मैं था तुझे बुलाता, संगीत में भजन में Il मेरे लिए खडा था, दुखियों के द्वार पर तू मैं बाट जोहता था, तेरी किसी चमन में ।l बनकर किसी के आँसू, मेरे लिए बहा तू। आँखे लगी थी मेरी , तब मान और धन में।l बजाबजा कर, मैं था नुझे रिझाता | শডী तब तू लगा हुआ था, पतितों के संगठन में। मैं था विरक्त तुझसे , जग की अनित्यता पर। HII तब तू किसी ' उत्थान भर रहा था, बेबस गिरे हुओं के, तू बीच में खड़ा था। मैं स्वर्ग देखता था, झुकता कहाँ चरन में IIl तूने दिया अनेकों अवसर न मिल सका मैं। तू कर्म में मगन ' था, मैं व्यस्त था कथन मेंIl तेरा पता सिकंदर को , मैं समझ रहा था। पर तू बसा हुआ था, फरहाद कोहकन में Il मैं ढूँढता तुझे था, जब कुंज और वन में। तू खोजता मुझे था, तब दीन के सदन में Il तू 'आहे' बन किसी की, मुझको पुकारता था। मैं था तुझे बुलाता, संगीत में भजन में Il मेरे लिए खडा था, दुखियों के द्वार पर तू मैं बाट जोहता था, तेरी किसी चमन में ।l बनकर किसी के आँसू, मेरे लिए बहा तू। आँखे लगी थी मेरी , तब मान और धन में।l बजाबजा कर, मैं था नुझे रिझाता | শডী तब तू लगा हुआ था, पतितों के संगठन में। मैं था विरक्त तुझसे , जग की अनित्यता पर। HII तब तू किसी ' उत्थान भर रहा था, बेबस गिरे हुओं के, तू बीच में खड़ा था। मैं स्वर्ग देखता था, झुकता कहाँ चरन में IIl तूने दिया अनेकों अवसर न मिल सका मैं। तू कर्म में मगन ' था, मैं व्यस्त था कथन मेंIl तेरा पता सिकंदर को , मैं समझ रहा था। पर तू बसा हुआ था, फरहाद कोहकन में Il - ShareChat