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#मेरी कविता #📚कविता-कहानी संग्रह
मेरी कविता - जलता ही गया मैं जैसे-जैसे मुझे जलाया गया था मतलब की आग में जैसे-जैसे झुलसाया गया था बिखरता ही गया मैं जैसे-्जैसे मुझे बिखराया गया था मन के शाख से पत्तों को जैसे-्जैसे झड़ाया गया था उलझता ही गया मैं जैसे-्जैसे मुझे उलझाया गया था बिन सवाल के प्रश्नों को जैसे जैसे जवाब बनाया गया था टूटता ही गया मैं जैसे-्जैसे मुझे तुड़वाया गया था मेहनत से बने मकान को जैसे-जैसे हटवाया गया था चुभता ही गया मैं जैसे-जैसे मुझे चुभवाया गया था तोड़कर फूल जैसे-जैसे कांटों को बचाया गया था उड़ता ही गया मैं जैसे-्जैसे मुझे उड़ाया गया था खुदगर्जी के आसमान से जैसे-जैसे मुझे गिराया गया था फिर फिसलता ही गया मैं जैसे-्जैसे मुझे फिसलाया गया था खड़ा हूं रब की मेहर से ऐसे जैसे-जैसे मुझे बचाया गया था q स्वाती छीपा जलता ही गया मैं जैसे-जैसे मुझे जलाया गया था मतलब की आग में जैसे-जैसे झुलसाया गया था बिखरता ही गया मैं जैसे-्जैसे मुझे बिखराया गया था मन के शाख से पत्तों को जैसे-्जैसे झड़ाया गया था उलझता ही गया मैं जैसे-्जैसे मुझे उलझाया गया था बिन सवाल के प्रश्नों को जैसे जैसे जवाब बनाया गया था टूटता ही गया मैं जैसे-्जैसे मुझे तुड़वाया गया था मेहनत से बने मकान को जैसे-जैसे हटवाया गया था चुभता ही गया मैं जैसे-जैसे मुझे चुभवाया गया था तोड़कर फूल जैसे-जैसे कांटों को बचाया गया था उड़ता ही गया मैं जैसे-्जैसे मुझे उड़ाया गया था खुदगर्जी के आसमान से जैसे-जैसे मुझे गिराया गया था फिर फिसलता ही गया मैं जैसे-्जैसे मुझे फिसलाया गया था खड़ा हूं रब की मेहर से ऐसे जैसे-जैसे मुझे बचाया गया था q स्वाती छीपा - ShareChat