#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣7️⃣6️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
पाण्डवों तथा धृतराष्ट्रपुत्रों की बालक्रीड़ा, दुर्योधन का भीमसेन को विष खिलाना तथा गंगा में ढकेलना और भीम का नागलोक में पहुँचकर आठ कुण्डों के दिव्य रस का पान करना...(दिन 376)
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फलानि वृक्षमारुह्य विचिन्वन्ति च ते तदा । तदा पादप्रहारेण भीमः कम्पयते द्रुमान् ।। २१ ।।
जब कौरव वृक्षपर चढ़कर फल तोड़ने लगते, तब भीमसेन पैरसे ठोकर मारकर उन पेड़ोंको हिला देते थे ।। २१ ।।
प्रहारवेगाभिहता द्रुमा व्याघूर्णितास्ततः । सफलाः प्रपतन्ति स्म द्रुतं त्रस्ताः कुमारकाः ।। २२ ।।
उनके वेगपूर्वक प्रहारसे आहत हो वे वृक्ष हिलने लगते और उनपर चढ़े हुए धृतराष्ट्रकुमार भयभीत हो फलोंसहित नीचे गिर पड़ते थे ।। २२ ।।
न ते नियुद्धे न जवे न योग्यासु कदाचन । कुमारा उत्तरं चक्क्रुः स्पर्धमाना वृकोदरम् ।। २३ ।।
कुश्तीमें, दौड़ लगानेमें तथा शिक्षाके अभ्यासमें धृतराष्ट्रकुमार सदा लाग-डॉट रखते हुए भी कभी भीमसेनकी बराबरी नहीं कर पाते थे ।। २३ ।।
एवं स धार्तराष्ट्रांश्च स्पर्धमानो वृकोदरः । अप्रियेऽतिष्ठदत्यन्तं बाल्यान्न द्रोहचेतसा ।। २४ ।।
इसी प्रकार भीमसेन भी धृतराष्ट्रपुत्रोंसे स्पर्धा रखते हुए उनके अत्यन्त अप्रिय कार्योंमें ही लगे रहते थे। परंतु उनके मनमें कौरवोंके प्रति द्वेष नहीं था, वे बाल-स्वभावके कारण ही वैसा करते थे ।। २४ ।।
ततो बलमतिख्यातं धार्तराष्ट्रः प्रतापवान् । भीमसेनस्य तज्ज्ञात्वा दुष्टभावमदर्शयत् ।। २५ ।।
तब धृतराष्ट्रका प्रतापी पुत्र दुर्योधन यह जानकर कि भीमसेनमें अत्यन्त विख्यात बल है, उनके प्रति दुष्टभाव प्रदर्शित करने लगा ।। २५ ।।
तस्य धर्मादपेतस्य पापानि परिपश्यतः ।
मोहादैश्वर्यलोभाच्च पापा मतिरजायत ।। २६ ।।
वह सदा धर्मसे दूर रहता और पापकर्मोंपर ही दृष्टि रखता था। मोह और ऐश्वर्यके लोभसे उसके मनमें पापपूर्ण विचार भर गये थे ।। २६ ।।
अयं बलवतां श्रेष्ठः कुन्तीपुत्रो वृकोदरः ।
मध्यमः पाण्डुपुत्राणां निकृत्या संनिगृह्यताम् ।। २७ ।।
वह अपने भाइयोंके साथ विचार करने लगा कि 'यह मध्यम पाण्डुपुत्र कुन्तीनन्दन भीम बलवानोंमें सबसे बढ़कर है। इसे धोखा देकर कैद कर लेना चाहिये ।। २७ ।।
प्राणवान् विक्रमी चैव शौर्येण महतान्वितः ।
स्पर्धते चापि सहितानस्मानेको वृकोदरः ।। २८ ।।
'यह बलवान् और पराक्रमी तो है ही, महान् शौर्यसे भी सम्पन्न है। भीमसेन अकेला ही हम सब लोगोंसे होड बद लेता है ।। २८ ।।
तं तु सुप्तं पुरोद्याने गङ्गायां प्रक्षिपामहे । अथ तस्मादवरजं श्रेष्ठं चैव युधिष्ठिरम् ।। २९ ।।
प्रसह्य बन्धने बद्ध्वा प्रशासिष्ये वसुंधराम् ।
एवं स निश्चयं पापः कृत्वा दुर्योधनस्तदा ।
नित्यमेवान्तरप्रेक्षी भीमस्यासीन्महात्मनः ।। ३० ।।
'इसलिये नगरोद्यानमें जब वह सो जाय, तब उसे उठाकर हमलोग गंगाजीमें फेंक दें। इसके बाद उसके छोटे भाई अर्जुन और बड़े भाई युधिष्ठिरको बलपूर्वक कैदमें डालकर मैं अकेला ही सारी पृथ्वीका शासन करूँगा।' ऐसा निश्चय करके पापी दुर्योधन महात्मा भीमसेन का अनिष्ट करने के लिये सदा मौका ढूँढ़ता रहता था ।। २९-३० ।।
ततो जलविहारार्थ कारयामास भारत ।
चैलकम्बलवेश्मानि विचित्राणि महान्ति च ।। ३१ ।।
जनमेजय ! तदनन्तर दुर्योधन ने गंगातट पर जल-विहार के लिये ऊनी और सूती कपड़ों के विचित्र एवं विशाल गृह तैयार कराये ।। ३१ ।।
सर्वकामैः सुपूर्णानि पताकोच्छ्रायवन्ति च।
तत्र संजनयामास नानागाराण्यनेकशः ।। ३२ ।।
वे गृह सब प्रकारकी अभीष्ट सामग्रियोंसे भरे-पूरे थे। उनके ऊपर ऊँची-ऊँची पताकाएँ फहरा रही थीं। उनमें उसने अलग-अलग अनेक प्रकार के बहुत-से कमरे बनवाये थे ।। ३२ ।।
उदकक्रीडनं नाम कारयामास भारत ।
प्रमाणकोट्यां तं देशं स्थलं किंचिदुपेत्य ह ।। ३३ ।।
भारत ! गंगातटवर्ती प्रमाणकोटि तीर्थमें किसी स्थानपर जाकर दुर्योधनने यह सारा आयोजन करवाया था। उसने उस स्थानका नाम रखा था उदकक्रीडन ।। ३३ ।।
भक्ष्यं भोज्यं च पेयं च चोष्यं लेह्यमथापि च । उपपादितं नरैस्तत्र कुशलैः सूदकर्मणि ।। ३४ ।।
वहाँ रसोईके काममें कुशल कितने ही मनुष्योंने जुटकर खाने-पीनेके बहुत-से भक्ष्य, भोज्य, पेय, चोष्य और लेह्य पदार्थ तैयार किये ।। ३४ ।।
न्यवेदयंस्तत् पुरुषा धार्तराष्ट्राय वै तदा ।
ततो दुर्योधनस्तत्र पाण्डवानाह दुर्मतिः ।। ३५ ।।
तदनन्तर राजपुरुषोंने दुर्योधनको सूचना दी कि 'सब तैयारी पूरी हो गयी है।' तब
खोटी बुद्धिवाले दुर्योधन ने पाण्डवों से कहा- ।। ३५ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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