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2122 2122 212
इक नज़र में ही मुहब्बत हो गई
सर झुकाया तो इबादत हो गई
बात मैं कैसे बताऊँ उन्हें की
मेरे दिल को तेरी आदत हो गई
हम सजाये फिरते थे होठों पे जो
आज पूरी वो ही मन्नत हो गई
शौख नज़रो ने किया घायल हमें
हाय कैसी ये कयामत हो गई
युँ सजाया मुझे पलको पे सनम
जब झुकी पलकें तिजारत हो गई
मैं भटकता ही रहा हूँ उम्र भर
अब मुकम्मल मेरी चाहत हो गई
वो मिले तो खिल उठी ये ज़िन्दगी
बे करारे दिल को राहत हो गई
( लक्ष्मण दावानी ✍ )
8/6/2018 #शायरी #📚कविता-कहानी संग्रह #✒ शायरी #💝 शायराना इश्क़ #📜मेरी कलम से✒️