ShareChat
click to see wallet page
search
वही रहता है सब लेकिन ज़माना छूट जाता है परी सी बेटियों का मुस्कुराना छूट जाता है अधूरा ज़िंदगी का हर फ़साना छूट जाता है वो चिड़ियों सा फुदकना चहचहाना छूट जाता है जदीदी दौर में भी है क़दीमी बेटी की क़िस्मत जुदा होते ही बचपन से घराना छूट जाता है जो कल तक घर था बेटी का हुआ है माएका अब वो ज़रा सी रस्म से ही आशियाना छूट जाता है अगर माँ ठंडी रोटी दें तो हम नाराज़ होते हैं मगर ससुराल जा कर गर्म खाना छूट जाता है कोई बग़िया समर के बिन रहे सूनी न इस ख़ातिर शजर बाबा के आँगन का पुराना छूट जाता है मुहय्या ऐश-ओ-इशरत का असासा है हमें यूँ तो मगर इस में खिलौनों का ख़ज़ाना छूट जाता है रहें माँ-बाप जब तक पूछी जाती है हर इक बेटी फिर अपने गाँव उस का आना-जाना छूट जाता है जहाँ की सारी ज़िम्मेदारियाँ हैं मुनहसिर हम पर न छूटे काम हम से बस कमाना छूट जाता है ज़रा से दिल में रखने पड़ते हैं पर्वत से ग़म हम को ज़रा सी बात पर आँसू बहाना छूट जाता है यहाँ इक 'आरज़ू' को गुल की निकहत सा बनाने में हज़ारों ख़्वाब का मौसम सुहाना छूट जाता है #જીવનગાથા
જીવનગાથા - ShareChat