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#महाभारत श्रीमहाभारतकथा-3️⃣7️⃣4️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः पाण्डु और माद्री की अस्थियों का दाह-संस्कार तथा भाई-बन्धुओं द्वारा उनके लिये जलांजलिदान...(दिन 374) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ अयमस्मानपाहाय दुःखे चाधाय शाश्वते । कृत्वा चास्माननाथांश्च क्व यास्यति नराधिपः ।। १५ ।। वे कहते जाते थे- 'हाय! ये महाराज हमलोगोंको छोड़कर, हमें सदाके लिये भारी दुःखमें डालकर और हम सबको अनाथ करके कहाँ जा रहे हैं' ।। १५ ।। क्रोशन्तः पाण्डवाः सर्वे भीष्मो विदुर एव च । रमणीये वनोद्देशे गङ्गातीरे समे शुभे ।। १६ ।। न्यासयामासुरथ तां शिबिकां सत्यवादिनः । सभार्यस्य नृसिंहस्य पाण्डोरक्लिष्टकर्मणः ।। १७ ।। समस्त पाण्डव, भीष्म तथा विदुरजी क्रन्दन करते हुए जा रहे थे। वनके रमणीय प्रदेशमें गंगाजीके शुभ एवं समतल तटपर उन लोगोंने, अनायास ही महान् पराक्रम करनेवाले सत्यवादी नरश्रेष्ठ पाण्डु और उनकी पत्नी माद्रीकी उस शिबिकाको रखा ।। १६-१७ ।। ततस्तस्य शरीरं तु सर्वगन्धाधिवासितम् । शुचिकालीयकादिग्धं दिव्यचन्दनरूषितम् ।। १८ ।। पर्यषिञ्चञ्जलेनाशु शातकुम्भमयैर्घटैः । चन्दनेन च शुक्लेन सर्वतः समलेपयन् ।। १९ ।। कालागुरुविमिश्रण तथा तुङ्गरसेन च । अथैनं देशजैः शुक्लैर्वासोभिः समयोजयन् ।। २० ।। तदनन्तर राजा पाण्डुकी अस्थियोंको सब प्रकारकी सुगन्धोंसे सुवासित करके उनपर पवित्र काले अगरका लेप किया गया। फिर उन्हें दिव्य चन्दनसे चर्चित करके सोनेके कलशोंद्वारा लाये हुए गंगाजलसे भाई-बन्धुओंने उसका अभिषेक किया। तत्पश्चात् उनपर सब ओरसे काले अगरसे मिश्रित तुंगरस नामक ग्रन्ध-द्रव्यका एवं श्वेत चन्दनका लेप किया गया। इसके बाद उन्हें सफेद स्वदेशी वस्त्रों से ढक दिया गया ।। १८-२० ।। संछन्नः स तु वासोभिर्जीवन्निव नराधिपः । शुशुभे स नरव्याघ्रो महार्हशयनोचितः ।। २१ ।। इस प्रकार बहुमूल्य शय्यापर शयन करनेयोग्य नरश्रेष्ठ राजा पाण्डुकी अस्थियाँ वस्त्रोंसे आच्छादित हो जीवित मनुष्यकी भाँति शोभा पाने लगीं ।। २१ ।। (हयमेधाग्निना सर्वे याजकाः सपुरोहिताः । वेदोक्तेन विधानेन क्रियाश्चक्रुः समन्त्रकम् ।।) याजकैरभ्यनुज्ञाते प्रेतकर्मण्यनुष्ठिते । घृतावसिक्तं राजानं सह माद्र्या स्वलंकृतम् ।। २२ ।। समस्त याजकों और पुरोहितोंने अश्वमेधकी अग्निसे वेदोक्त विधिके अनुसार मन्त्रोच्चारणपूर्वक सारी क्रियाएँ सम्पन्न कीं। याजकोंकी आज्ञा लेकर प्रेतकर्म आरम्भ करते समय माद्रीसहित अलंकारयुक्त राजाका घृतसे अभिषेक किया गया ।। २२ ।। तुङ्गपद्मकमिश्रेण चन्दनेन सुगन्धिना । अन्यैश्च विविधैर्गन्धैर्विधिना समदाहयन् ।। २३ ।। फिर तुंग और पद्मकमिश्रित सुगन्धित चन्दन तथा अन्य विविध प्रकार के गन्ध-द्रव्यों से भाई-बन्धुओं ने युधिष्ठिर द्वारा विधिपूर्वक उन दोनों का दाह-संस्कार कराया ।। २३ ।। ततस्तयोः शरीरे द्वे दृष्ट्वा मोहवशं गता । हा हा पुत्रेति कौसल्या पपात सहसा भुवि ।। २४ ।। उस समय उन दोनोंकी अस्थियोंको देखकर माता कौसल्या (अम्बालिका) 'हा पुत्र ! हा पुत्र !' कहती हुई सहसा मूर्च्छित हो पृथ्वीपर गिर पड़ी ।। २४ ।। तां प्रेक्ष्य पतितामार्ता पौरजानपदो जनः । रुरोद दुःखसंतप्तो राजभक्त्या कृपान्वितः ।। २५ ।। उसे इस प्रकार शोकातुर हो भूमिपर पड़ी देख नगर और जनपदके लोग राजभक्ति तथा दयासे द्रवित एवं दुःखसे संतप्त हो फूट-फूटकर रोने लगे ।। २५ ।। कुन्त्याश्चैवार्तनादेन सर्वाणि च विचुक्रुशुः । मानुषैः सह भूतानि तिर्यग्योनिगतान्यपि ।। २६ ।। कुन्ती के आर्तनाद से मनुष्यों सहित समस्त पशु और पक्षी आदि प्राणी भी करुण क्रन्दन करने लगे ।। २६ ।। तथा भीष्मः शान्तनवो विदुरश्च महामतिः । सर्वशः कौरवाश्चैव प्राणदन् भृशदुःखिताः ।। २७ ।। शन्तनुनन्दन भीष्म, परम बुद्धिमान् विदुर तथा सम्पूर्ण कौरव भी अत्यन्त दुःखमें निमग्न हो रोने लगे ।। २७ ।। ततो भीष्मोऽथ विदुरो राजा च सह पाण्डवैः । उदकं चक्रिरे तस्य सर्वाश्च कुरुयोषितः ।। २८ ।। तदनन्तर भीष्म, विदुर, राजा धृतराष्ट्र तथा पाण्डवोंके सहित कुरुकुलकी सभी स्त्रियोंने राजा पाण्डुके लिये जलांजलि दी ।। २८ ।। चुक्क्रुशुः पाण्डवाः सर्वे भीष्मः शान्तनवस्तथा । विदुरो ज्ञातयश्चैव चक्क्रुश्चाप्युदकक्रियाः ।। २९ ।। उस समय सभी पाण्डव पिताके लिये रो रहे थे। शन्तनुनन्दन भीष्म, विदुर तथा अन्य भाई-बन्धुओं की भी यही दशा थी। सबने जलांजलि देने की क्रिया पूरी की ।। २९ ।। कृतोदकांस्तानादाय पाण्डवाञ्छोककर्शितान् । सर्वाः प्रकृतयो राजन् शोचमाना न्यवारयन् ।। ३० ।। जलांजलिदान करके शोकसे दुर्बल हुए पाण्डवोंको साथ ले मन्त्री आदि सब लोग स्वयं भी दुःखी हो उन सबको समझा-बुझाकर शोक करनेसे रोकने लगे ।। ३० ।। यथैव पाण्डवा भूमौ सुषुपुः सह बान्धवैः । तथैव नागरा राजन् शिश्यिरे ब्राह्मणादयः ।। ३१ ।। तद्गतानन्दमस्वस्थमाकुमारमहृष्टवत् । बभूव पाण्डवैः सार्धं नगरं द्वादश क्षपाः ।। ३२ ।। राजन् ! बारह रात्रियोंतक जिस प्रकार बन्धु-बान्धवों सहित पाण्डव भूमिपर सोये, उसी प्रकार ब्राह्मण आदि नागरिक भी धरतीपर ही सोते रहे। उतने दिनोंतक हस्तिनापुर नगर पाण्डवोंके साथ आनन्द और हर्षोल्लाससे शून्य रहा। बूढ़ोंसे लेकर बच्चेतक सभी वहाँ दुःखमें डूबे रहे। सारा नगर ही अस्वस्थचित्त हो गया था ।। ३१-३२ ।। इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि पाण्डुदाहे षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १२६ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें पाण्डुके दाहसंस्कारसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १२६ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
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