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#☝ मेरे विचार
☝ मेरे विचार - विशाल मलिक | रोहतक, हरियाणा टूटी कुर्सी से मिला जीवन  का अनमोल सबक हमारे घर के एक कोने में लकड़ी की पुरानी कुर्सी पड़ी रहती थी। पापा उसे   मेरी कुर्सी' कहते थे, लेकिन पढ़ाई से लेकर मोबाइल चलाने तक उस प़र सबसे ज्यादा हक तो मेरा ही हुआ करता था। मुझे भी वह पसंद थी। ಷaಣ ಶ एक दिन पीछे की ओर झूलते  हुए मेरी उसकी एक टांग टूट गई। पापा ऑफिस से लौटे तो डर के पापा, यह अपने आप टूट गई। ' मारे मैंने झूठ बोल दिया,  कुर्सी को देखा, फिर मेरी आंखों में झांका और बैस उन्होंने इतना कहा   हूं। ' रात को वे खुद ही टूलबॉक्स लेकर बैठ ठीक कर दी और गए। घंटों मेहनत के बाद उन्होंने कुर्सी मुझसे बोले   बैठकर देखो। ' मैं बैठा तो वह थोड़ी डगमगाई।  अभी पूरी ठीक नहीं हुई, कल इसे फिर पापा मुस्कराए से देखूँगा। ' फिर मेरी और देखकर बोले, बेटा, चीजें झूठ  हैं, झूठ बाद में आता  वे पहले टूटती बोलने से नहीं टूटतीं| है। लेकिन झूठ उनकी मरम्मत केठिन बना देता है।  तो पूरी तरह से इस्तेमाल के कुर्सी  ক্তুন্ত বিনী নান ন্ত डगमगाहट कभी  लायक हो गई थी। लेकिन उसकी  हल्को पूरी तरह नहीं गई। सालों बाद मुझे समझ में आया कि उस  दिन पापा कुर्सी को नहीं, बल्कि मुझे ठीक कर रहे थे। शायद कुर्सी में वह डगमगाहट उन्होंने जानबूझकर ही छोड़ दी थी  है, लेकिन झूठ सकती सुधर  ताकि मुझे याद रहे कि गलती निशान छोड़ जाता है। उसका  विशाल मलिक | रोहतक, हरियाणा टूटी कुर्सी से मिला जीवन  का अनमोल सबक हमारे घर के एक कोने में लकड़ी की पुरानी कुर्सी पड़ी रहती थी। पापा उसे   मेरी कुर्सी' कहते थे, लेकिन पढ़ाई से लेकर मोबाइल चलाने तक उस प़र सबसे ज्यादा हक तो मेरा ही हुआ करता था। मुझे भी वह पसंद थी। ಷaಣ ಶ एक दिन पीछे की ओर झूलते  हुए मेरी उसकी एक टांग टूट गई। पापा ऑफिस से लौटे तो डर के पापा, यह अपने आप टूट गई। ' मारे मैंने झूठ बोल दिया,  कुर्सी को देखा, फिर मेरी आंखों में झांका और बैस उन्होंने इतना कहा   हूं। ' रात को वे खुद ही टूलबॉक्स लेकर बैठ ठीक कर दी और गए। घंटों मेहनत के बाद उन्होंने कुर्सी मुझसे बोले   बैठकर देखो। ' मैं बैठा तो वह थोड़ी डगमगाई।  अभी पूरी ठीक नहीं हुई, कल इसे फिर पापा मुस्कराए से देखूँगा। ' फिर मेरी और देखकर बोले, बेटा, चीजें झूठ  हैं, झूठ बाद में आता  वे पहले टूटती बोलने से नहीं टूटतीं| है। लेकिन झूठ उनकी मरम्मत केठिन बना देता है।  तो पूरी तरह से इस्तेमाल के कुर्सी  ক্তুন্ত বিনী নান ন্ত डगमगाहट कभी  लायक हो गई थी। लेकिन उसकी  हल्को पूरी तरह नहीं गई। सालों बाद मुझे समझ में आया कि उस  दिन पापा कुर्सी को नहीं, बल्कि मुझे ठीक कर रहे थे। शायद कुर्सी में वह डगमगाहट उन्होंने जानबूझकर ही छोड़ दी थी  है, लेकिन झूठ सकती सुधर  ताकि मुझे याद रहे कि गलती निशान छोड़ जाता है। उसका - ShareChat