सुनील जैन
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सुनील जैन
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#☝ मेरे विचार
☝ मेरे विचार - सुविचार जो जितना शांत होता है, वो उतनी ही गहराई से अपनी बुद्धि का प्रयोग कर सकता 81 सुविचार जो जितना शांत होता है, वो उतनी ही गहराई से अपनी बुद्धि का प्रयोग कर सकता 81 - ShareChat
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☝ मेरे विचार - कोकू आज तेरे मार्क्स बढिया आए है क्या खा रहा है आज कल कोकू मम्मी की चप्पल उठा कर दिखाते हुए नानू आपकी बेटी की चप्पल की मार खा रहा हूँ कोकू आज तेरे मार्क्स बढिया आए है क्या खा रहा है आज कल कोकू मम्मी की चप्पल उठा कर दिखाते हुए नानू आपकी बेटी की चप्पल की मार खा रहा हूँ - ShareChat
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☝ मेरे विचार - #wife ವಣ নিননা मुझसे लेकिन सच में मर्जी कलेश करले, 41 वो देवी है देवी / क्योकि उसने कभीं भी मुझे पहाड़ सें धक्का देने का नहीं सोचा। #wife ವಣ নিননা मुझसे लेकिन सच में मर्जी कलेश करले, 41 वो देवी है देवी / क्योकि उसने कभीं भी मुझे पहाड़ सें धक्का देने का नहीं सोचा। - ShareChat
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☝ मेरे विचार - 14~90ட शब्दोंका जाद नया चश्मा সাক্চ-সাক্চ নিম্রা নন নাল पुराने चश्मे को बदलकर aatu चाहता हूं నTశాTT पर अचानक नजर 8 বভ্নী पास ही बैठी नारायणपुर से रायपुर कॉलेज पढ़ने आई मासूम-सी दोस्त पर मेँ मुफ्त जिसने स्कूल मिले चश्मे को अपनी संपत्ति मान रखा है दिन में एक बार भोजन करके बड़ा ्सा कोर्स  छोटे से दिन में पढ़कर चाहती है कुछ बन जाना दिन भर लाइब्रेरी के सूनेपन को चीरती उसकी खामोशी बस्तर के जंगलों का हरापन है जिसमें बम के धमाकों की आवाज और गोलियों की सनसनाहट है उठकर साफ करता हूं अपना चश्मा सब कुछ अब पहले से साफ दिखने लगा है। -दीपक नवीन रायपुर, छत्तीसगढ़ ( मूल कविता के सम्पादित अंश ) 14~90ட शब्दोंका जाद नया चश्मा সাক্চ-সাক্চ নিম্রা নন নাল पुराने चश्मे को बदलकर aatu चाहता हूं నTశాTT पर अचानक नजर 8 বভ্নী पास ही बैठी नारायणपुर से रायपुर कॉलेज पढ़ने आई मासूम-सी दोस्त पर मेँ मुफ्त जिसने स्कूल मिले चश्मे को अपनी संपत्ति मान रखा है दिन में एक बार भोजन करके बड़ा ्सा कोर्स  छोटे से दिन में पढ़कर चाहती है कुछ बन जाना दिन भर लाइब्रेरी के सूनेपन को चीरती उसकी खामोशी बस्तर के जंगलों का हरापन है जिसमें बम के धमाकों की आवाज और गोलियों की सनसनाहट है उठकर साफ करता हूं अपना चश्मा सब कुछ अब पहले से साफ दिखने लगा है। -दीपक नवीन रायपुर, छत्तीसगढ़ ( मूल कविता के सम्पादित अंश ) - ShareChat
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☝ मेरे विचार - humarehanumanegmailcom नींद के नियम तोड़ेंगे तो रोग देह में प्रवेश के लिए तैयार हैं इन दिनों ज्यादातर लोग जिस बात को लेकर बेफिक्र हैं, वो है नींद का मामला। कुछ लोग बहुत कम सोते हैं और कुछ बेवक्त सोते हैं। पिछले दिनों एक बड़े राजनेता मुझे मिले और उनका कहना था कि सालों से मैं चार पांच घंटे सो रहा हूं। थोड़ी देर बाद उन्होंने यह भी कहा कि इन ক্কিী मेरी स्मृति थोड़ी कमजोर हो रही है। एक अजीबन्सी थकान लग है, जबकि मुझे राजनीति में अभी आगे जाना है। यहीं से यह बात লিব हम सबके सीखने वाली है कि नींद के साथ किया जा ল खिलवाड़ घातक साबित होगा। अगर आप छ्ह घंटे से कम सो और बेवक्त नींद निकाल रहे हैं तो इनसोम्निया, स्लीप एप्निया विकार उतरेंगे और अल्जाइमर आपके जीवन में आ जाएगा। तो तो कितने ही व्यस्त हों, सात घंटे तो सोएं। और एक नियम तय करें बात सूर्योदय के एक घंटे बाद तक बिस्तर पर न रहें और सूर्यास्त के छ्ह  कि घंटे बाद अवश्य सो जाएं। ने मनुष्य का शरीर कुछ नियमों के प्रकृति साथ बनाया है और जब नींद के नियम तोँड़े जाएंगे तो घाँतक बीमारियां रास्ता ही देख रही हैं देह में प्रवेश करने के লিবI Facebook:Pt Vijayshankar Mehta humarehanumanegmailcom नींद के नियम तोड़ेंगे तो रोग देह में प्रवेश के लिए तैयार हैं इन दिनों ज्यादातर लोग जिस बात को लेकर बेफिक्र हैं, वो है नींद का मामला। कुछ लोग बहुत कम सोते हैं और कुछ बेवक्त सोते हैं। पिछले दिनों एक बड़े राजनेता मुझे मिले और उनका कहना था कि सालों से मैं चार पांच घंटे सो रहा हूं। थोड़ी देर बाद उन्होंने यह भी कहा कि इन ক্কিী मेरी स्मृति थोड़ी कमजोर हो रही है। एक अजीबन्सी थकान लग है, जबकि मुझे राजनीति में अभी आगे जाना है। यहीं से यह बात লিব हम सबके सीखने वाली है कि नींद के साथ किया जा ল खिलवाड़ घातक साबित होगा। अगर आप छ्ह घंटे से कम सो और बेवक्त नींद निकाल रहे हैं तो इनसोम्निया, स्लीप एप्निया विकार उतरेंगे और अल्जाइमर आपके जीवन में आ जाएगा। तो तो कितने ही व्यस्त हों, सात घंटे तो सोएं। और एक नियम तय करें बात सूर्योदय के एक घंटे बाद तक बिस्तर पर न रहें और सूर्यास्त के छ्ह  कि घंटे बाद अवश्य सो जाएं। ने मनुष्य का शरीर कुछ नियमों के प्रकृति साथ बनाया है और जब नींद के नियम तोँड़े जाएंगे तो घाँतक बीमारियां रास्ता ही देख रही हैं देह में प्रवेश करने के লিবI Facebook:Pt Vijayshankar Mehta - ShareChat
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☝ मेरे विचार - संपादळीय fas दलबदल कानून किस पर आकर नाकाम हो रहा है? दो संविधान संशोधनों और अपने अस्तित्व के ४१ साल बाद भी दलबदल कानून लक्ष्य पाने में नाकाम रहा है। दरअसल नैतिक पतन का (और मात्र कानून नहीं कर सकता। पश्चिम बंगाल अब इलाज महाराष्ट्र ) के सांसदों के पाला बदलने से एक बार फिर एक अनजान दल बगैर किसी चुनावी जीत के संसद में बड़ी पार्टी बनने जा रहा है। यह उस बड़ी बीमारी को बताता है जो संवैधानिक उद्देश्यों को प्रभावहीन कर रही है। सत्ताधारी गठबंधन इस दलबदल से मजबूत होकर संविधान संशोधन दोनों सदनों में अपेक्षित दो-तिहाई बहुमत हासिल कर सकता है। f ಫ ५२वें ( १९८५ ) और श१वें ( २००३ ) संविधान संशोधनों ने दलबदल की प्रक्रिया के कारणों के मूल में गए बगैर संख्यात्मक बंदिशें लगाईं। स्प्लिट को मर्जर में यानी विधायिकाओं में मूल पार्टी की कुल बंदला संख्या के दो-तिहाई से निकलने वाले समूह का किसी दल में विलय केंद्र किसी  और राज्य स्तर पर सैकड़ों पार्टियां हैं। शर्त बना। भारत मेँ को भी पकड़ लें। कानून देखता रह जाएगा। सुप्रीम कोर्ट के दर्जनों फैसले भी नैतिक पतन को नहीं रोक सके। दलबदल पूर्णतः गलत है लेकिन इसे इसलिए कानून में कुछ प्रतिबंधों के साथ a गया कि वैचारिक स्तर पर सांसद विधायक पार्टी के बंधक न रहें सामूहिक प्रतिकार करें। लेकिन तब क्या व्हिप के तहत उन्हें बाध्य करना उस्ी सिद्धांत की अनदेखी नहीं है? बेहतर होता कि अगर किसी पार्टी के टिकट पर कोई चुनाव जीता हो तो दल छोड़ने पर सदस्यता स्वतः खत्म मानी जाए। संपादळीय fas दलबदल कानून किस पर आकर नाकाम हो रहा है? दो संविधान संशोधनों और अपने अस्तित्व के ४१ साल बाद भी दलबदल कानून लक्ष्य पाने में नाकाम रहा है। दरअसल नैतिक पतन का (और मात्र कानून नहीं कर सकता। पश्चिम बंगाल अब इलाज महाराष्ट्र ) के सांसदों के पाला बदलने से एक बार फिर एक अनजान दल बगैर किसी चुनावी जीत के संसद में बड़ी पार्टी बनने जा रहा है। यह उस बड़ी बीमारी को बताता है जो संवैधानिक उद्देश्यों को प्रभावहीन कर रही है। सत्ताधारी गठबंधन इस दलबदल से मजबूत होकर संविधान संशोधन दोनों सदनों में अपेक्षित दो-तिहाई बहुमत हासिल कर सकता है। f ಫ ५२वें ( १९८५ ) और श१वें ( २००३ ) संविधान संशोधनों ने दलबदल की प्रक्रिया के कारणों के मूल में गए बगैर संख्यात्मक बंदिशें लगाईं। स्प्लिट को मर्जर में यानी विधायिकाओं में मूल पार्टी की कुल बंदला संख्या के दो-तिहाई से निकलने वाले समूह का किसी दल में विलय केंद्र किसी  और राज्य स्तर पर सैकड़ों पार्टियां हैं। शर्त बना। भारत मेँ को भी पकड़ लें। कानून देखता रह जाएगा। सुप्रीम कोर्ट के दर्जनों फैसले भी नैतिक पतन को नहीं रोक सके। दलबदल पूर्णतः गलत है लेकिन इसे इसलिए कानून में कुछ प्रतिबंधों के साथ a गया कि वैचारिक स्तर पर सांसद विधायक पार्टी के बंधक न रहें सामूहिक प्रतिकार करें। लेकिन तब क्या व्हिप के तहत उन्हें बाध्य करना उस्ी सिद्धांत की अनदेखी नहीं है? बेहतर होता कि अगर किसी पार्टी के टिकट पर कोई चुनाव जीता हो तो दल छोड़ने पर सदस्यता स्वतः खत्म मानी जाए। - ShareChat