।। ॐ ।।
अक्षराणामकारोऽस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च।
अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः॥
मैं अक्षरों में अकार-ओंकार तथा समासों में द्वन्द्व नामक समास हूँ। (साधना की उन्नत अवस्था में मन सिमटते-सिमटते केवल साधक और इष्ट आमने-सामने रह जाते हैं, शेष कोई संकल्प नहीं रह जाता, स्वामी सेवक में संघर्ष है; किन्तु द्वन्द्व की यह अवस्था भगवान की देन है।) अक्षयकाल मैं हूँ। काल सदैव परिवर्तनशील है; किन्तु वह समय जो अक्षय, अजर, अमर परमात्मा में प्रवेश दिलाता है, वह अवस्था मैं हूँ। विराट् स्वरूप अर्थात् सर्वत्र व्याप्त, सबको धारण-पोषण करनेवाला भी मैं ही हूँ। #यथार्थ गीता #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #❤️जीवन की सीख #🙏गुरु महिमा😇 #🧘सदगुरु जी🙏


