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#❤️जीवन की सीख #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏 प्रेरणादायक विचार #मेरे विचार
❤️जीवन की सीख - पर्युपासते। त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं ये सर्वत्रगमचिन्त्य कूटस्थमचलं e gaH सत्रियम्येन्दरियग्राम सर्वत्र समबुदद्वयः " ते সাদুননি सर्वभूतहिते ামল 0 परन्तु जो पुरुप इन्द्रियोंके समुदायको भलो प्रकार सर्वव्यापी , मन- बुद्धिसे  वशमे परे करक अकथनोयस्वरूप और सदा एकरस रहनेवाले नित्य अचल॰ निराकार, अविनाशी सच्चिदानन्दघ्न ब्रह्मको निरन्तर एकोभावसे ध्यान करते दए भजते हैं॰ वे सम्पूर्ण भूतांके हितमें रत और सबमें समान भाववाले योगी मुझको हो प्राप्त होते हैं"३-४" क्लेशोउ्धिकतरस्तेपामव्यक्तासक्तचेतसाम " हि गतिर्दःखं देहवद्िरवप्यते १। 38న =fச1<1=4 ஈ =அ आसक्त 37 चित्तवाले  पुरुपोंके faar 8; साधनमे परिश्रम क्योंकि देहाभिमानियोंके द्वारा अव्यक्तविपयक गति दःखपूर्वक प्राप्त को जाती है।।५ " ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि सन्यस्य मत्पराः 9 अनन्येनेच योगेन उपासते ।। मा அ परन्तु जो मेरे परायण रहनेवाले भक्तजन सम्पूर्ण कर्मोको मुझ्में अर्पण करके मुझ सगुणरूप परमेश्वरको हो अनन्य भक्तियोगसे निरन्तर चिन्तन करते डुए ಖತಗ ೪ Il ೯ Il समुद्धर्ता  मत्युसंसारसागरात्। तेपामर भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम।। हे॰ अजुंन! उन নিন লাননাল সমী सझमें भक्तोंका मे शोघ्र हो मृत्यरूप संसार - समुद्रसे उड्धार  কনেনালা চাঁনা ৪ুঁI1৩ Il मय्येव मन आधत्स्व मयि चुद्रि निवेशय। নিনমিষ্মি সমন অন কধ ন মহাম: I1 मुझमें हो युडिको लगाः  मनको लगा और সুপ্রদ तू मझमें हो निवास करेगा॰ इसपें হমক্ধ বপযান ಕತ 4 774 ೩1 ೯Il ೭ Il * इस श्लोकका विशेप भाव जाननेके लिये गीोता अध्याय ११ श्लोक ५५ देखना चाहिये। श्रीमढ्भगवढ्गीता अध्याय १२ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार पर्युपासते। त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं ये सर्वत्रगमचिन्त्य कूटस्थमचलं e gaH सत्रियम्येन्दरियग्राम सर्वत्र समबुदद्वयः " ते সাদুননি सर्वभूतहिते ামল 0 परन्तु जो पुरुप इन्द्रियोंके समुदायको भलो प्रकार सर्वव्यापी , मन- बुद्धिसे  वशमे परे करक अकथनोयस्वरूप और सदा एकरस रहनेवाले नित्य अचल॰ निराकार, अविनाशी सच्चिदानन्दघ्न ब्रह्मको निरन्तर एकोभावसे ध्यान करते दए भजते हैं॰ वे सम्पूर्ण भूतांके हितमें रत और सबमें समान भाववाले योगी मुझको हो प्राप्त होते हैं"३-४" क्लेशोउ्धिकतरस्तेपामव्यक्तासक्तचेतसाम " हि गतिर्दःखं देहवद्िरवप्यते १। 38న =fச1<1=4 ஈ =அ आसक्त 37 चित्तवाले  पुरुपोंके faar 8; साधनमे परिश्रम क्योंकि देहाभिमानियोंके द्वारा अव्यक्तविपयक गति दःखपूर्वक प्राप्त को जाती है।।५ " ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि सन्यस्य मत्पराः 9 अनन्येनेच योगेन उपासते ।। मा அ परन्तु जो मेरे परायण रहनेवाले भक्तजन सम्पूर्ण कर्मोको मुझ्में अर्पण करके मुझ सगुणरूप परमेश्वरको हो अनन्य भक्तियोगसे निरन्तर चिन्तन करते डुए ಖತಗ ೪ Il ೯ Il समुद्धर्ता  मत्युसंसारसागरात्। तेपामर भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम।। हे॰ अजुंन! उन নিন লাননাল সমী सझमें भक्तोंका मे शोघ्र हो मृत्यरूप संसार - समुद्रसे उड्धार  কনেনালা চাঁনা ৪ুঁI1৩ Il मय्येव मन आधत्स्व मयि चुद्रि निवेशय। নিনমিষ্মি সমন অন কধ ন মহাম: I1 मुझमें हो युडिको लगाः  मनको लगा और সুপ্রদ तू मझमें हो निवास करेगा॰ इसपें হমক্ধ বপযান ಕತ 4 774 ೩1 ೯Il ೭ Il * इस श्लोकका विशेप भाव जाननेके लिये गीोता अध्याय ११ श्लोक ५५ देखना चाहिये। श्रीमढ्भगवढ्गीता अध्याय १२ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार - ShareChat