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#☝ मेरे विचार
☝ मेरे विचार - रोशनी साहू भोपाल, मध्यप्रदेश  एक सफर, जिसने आत्मविश्वास सिखा दिया गर्मियों की छुट्टियां शुरू होने वाली थीं और मैँ नानी के घर जाने को लेकर बेहद उत्साहित थी। लेकिन इंस बार किसी पारिवारिक कारण से मां और पापा मेरे साथ नहीं जा सकते थे। तेरह साल की उम्र में अकेले सफर करने का विचार डराने वाला था, फिर भी जिद में मैँने जाने की ठान ली। स्टेशन पर ने मेरी जेब में एक मुड़ा हुआ कागज विदा करते समय पापा रखा और कहा, ' जब मेरी बहुत जरूरत महसूस हो, तभी इसे खोलना। ' ट्रेन चलने लगी तो उन्होंने कान मेँ धीरे से कहा, #శ్ే घबराना मत, मैं इसी ट्रेन के पीछे वाले डिब्बे लेकिन तुम्हें यह सफर खुद पूरा करना है। ' उनकी बात सुनकर मेरा डर काफी कम होे गया। हर बार घबराहट होती तो यही सोचती कि पापा पास ही हैं। धीरे धीरे आत्मविश्वास बढ़ता गया और सफर आराम से कट गया। नानी के गांव वाले स्टेशन पहुंचकर मैंने मामा से कहा, ' चलो, पहले पापा को भी पीछे वाले डिब्बे से ले लें। ' मामा मुस्कराए और बोले बेटा, इस ट्रेन में थे ही नहीं। वे तो तुम्हें स्टेशन पर 6{ पापा छोड़कर घर लौट गए थे। ' मैं अवाक् रह गई। मैंने जेब से वह मैं इस कागज निकाला। उस पर लिखा था,   मेरी प्यारी बेटी, ट्रेन में नहों हूं॰ लेकिन मेरा विश्वास हमेशा  साथ है। तुम्हारे मुझे पता था कि तुम यह सफर अकेले तय कर सकती हो। उस दिन समझ में आया कि पिता का विश्वास ही संतान का सबसे बड़ा आत्मविश्वास होता है। रोशनी साहू भोपाल, मध्यप्रदेश  एक सफर, जिसने आत्मविश्वास सिखा दिया गर्मियों की छुट्टियां शुरू होने वाली थीं और मैँ नानी के घर जाने को लेकर बेहद उत्साहित थी। लेकिन इंस बार किसी पारिवारिक कारण से मां और पापा मेरे साथ नहीं जा सकते थे। तेरह साल की उम्र में अकेले सफर करने का विचार डराने वाला था, फिर भी जिद में मैँने जाने की ठान ली। स्टेशन पर ने मेरी जेब में एक मुड़ा हुआ कागज विदा करते समय पापा रखा और कहा, ' जब मेरी बहुत जरूरत महसूस हो, तभी इसे खोलना। ' ट्रेन चलने लगी तो उन्होंने कान मेँ धीरे से कहा, #శ్ే घबराना मत, मैं इसी ट्रेन के पीछे वाले डिब्बे लेकिन तुम्हें यह सफर खुद पूरा करना है। ' उनकी बात सुनकर मेरा डर काफी कम होे गया। हर बार घबराहट होती तो यही सोचती कि पापा पास ही हैं। धीरे धीरे आत्मविश्वास बढ़ता गया और सफर आराम से कट गया। नानी के गांव वाले स्टेशन पहुंचकर मैंने मामा से कहा, ' चलो, पहले पापा को भी पीछे वाले डिब्बे से ले लें। ' मामा मुस्कराए और बोले बेटा, इस ट्रेन में थे ही नहीं। वे तो तुम्हें स्टेशन पर 6{ पापा छोड़कर घर लौट गए थे। ' मैं अवाक् रह गई। मैंने जेब से वह मैं इस कागज निकाला। उस पर लिखा था,   मेरी प्यारी बेटी, ट्रेन में नहों हूं॰ लेकिन मेरा विश्वास हमेशा  साथ है। तुम्हारे मुझे पता था कि तुम यह सफर अकेले तय कर सकती हो। उस दिन समझ में आया कि पिता का विश्वास ही संतान का सबसे बड़ा आत्मविश्वास होता है। - ShareChat