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Dr.Rakesh Sharma - Author on ShareChat: Funny, Romantic, Videos, Shayari, Quotes
Dr.Rakesh Sharma
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राजस्थान की सांस्कृतिक चेतना का जीवंत दस्तावेज : तोरावाटी का इतिहास #indoriatimes #BREAKING NEWS #samachar #news
indoriatimes - इन्दौरिया समाचार जगत Editorial राजस्थान की सांस्कृतिक चेतना का जीवंत दस्तावेज तोरावाटी   क्षेत्र राजस्थान की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत করা एक गौरवशाली अध्याय है। यहाँ की शिल्पकला, स्थापत्य, मूर्तिकला एवं भित्ति- चित्रकला न केवल क्षेत्रीय इतिहास को अभिव्यक्त करती हें, बल्कि भारतीय परम्परा की उत्कृष्टता का भी परिचय देती हैं।लेखक डॉ. महावीर प्रसाद कला शर्मा द्वारा रचित तोरावाटी का इतिहास इस दृष्टि से एक महत्त्वपूर्ण एवं प्रामाणिक ग्रन्थ है, जिसमें क्षेत्र की सांस्कृतिक धरोहरों का T एव वर्णन प्रस्तुत किया गया है। तथ्यपरक गुप्तकालीन प्रभावों से दिखाई तोरावाटी को कला परम्परा का आरम्भ देता है। विराटनगर स्थित बीजक की पहाड़ी़ से प्राप्त बौद्ध-विहार एव स्थापत्य अवशेष उस युग की उच्च स्थापत्य परम्परा के जीवंत प्रमाण हैं। गुर्जर - प्रतिहार काल में इस क्षेत्र की मूर्तिकला ने विशेष  इसक उपरान्त उ्कष प्राप्त किया। राजोरगढ़, नीलकंठ तथा तालवृक्ष से प्राप्त प्रतिमाएँ तत्कालीन शिल्पकारों की अद्धृत कलात्मक दक्षता को प्रमाणित करती हैँ विशेष रूप से तालवृक्ष से प्राप्त वराह भगवान की विशाल प्रतिमा भारतीय मूर्तिकला की अनुपम धरोहर मानी जाती है।काले संगमरमर पर सूक्ष्मता से उकेरी गई यह प्रतिमा दर्शाती है कि उस समय तोरावाटी अत्यन्त क्षेत्र में मूर्तिकला कितनी विकसित एवं परिपक्व अवस्था में थी।इसी प्रकार अमाई, आसपुरा, बेवां तथा कोटपूतली क्षेत्र से प्राप्त यक्षी, वीर- पुरुष स्मारक एवं नृसिंहावतार की प्रतिमाएँ भी इस क्षेत्र की समृद्ध शिल्प परम्परा का परिचय देती हैं कला की दृष्टि से भी तोरावाटी अत्यन्त समृद्ध रहा है। स्थापत्य विराटनगर का श्वेताम्बर जैन मन्दिर, मनोहरपुर के बावनजी एवं चतुर्भुजजी कोटपूतली की प्राचीन छ्तरियाँ तथा विभिन्रन किले के मन्दिर, पाटन एवं राजपूतः मुगल एवं स्थानीय स्थापत्य शैलियों के सुन्दर समन्चय के उदाहरण हैं। इन इमारतों में प्रयुक्त शिल्प-सौन्दर्य तत्कालीन समाज की कलात्मक अभिरुचि एवं सांस्कृतिक समृद्धि को दर्शाता है। तोरावाटी की भित्ति- चित्रकला विशेष रूप से उल्लेखनीय है। विराटनगर  मुगलद्वार, नारायणपुर के संज्यानाथजी मन्दिर, भाँखरी की सती लषमा का छत्री, पाटन, प्रागपुरा एवं बनेठी की छ्तरियों में अंकित चित्र राजस्थान की चित्रकला परम्परा को नई ऊँचाइयाँ प्रदान करते हॅं। इन चित्रों में रामायण कृष्णलीला   समुद्रमंथन शिकार   दृश्य নথা महाभारत राजदरवार लोकजीवन का अत्यन्त सजीव चित्रण किया है। चित्रों में प्रयुक्त T चटकीले लाल, हरे एवं कत्थई रंग स्थानीय लोक- संस्कृति और सौन्दर्यबोध को अभिव्यक्त करते हैं कलाकृतियों का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि इनमें केवल इन धार्मिक आख्यान ही नहीं॰ बल्कि लोकजीवन सामाजिक परम्पराएँ लोकविश्वास एवं जन- संस्कृति भी प्रतिबिम्बित होती है। यही कारण है कि तोरावाटी की कला केवल सौन्दर्य का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक एव सांस्कृतिक इतिहास का भी महत्त्वपूर्ण स्रोत है। दुर्भाग्यवश आज इन अमूल्य धरोहरों का बड़ा भाग संरक्षण के अभाव में नष्ट होने की स्थिति में पहुँच चुका है। अनेक भित्ति- चित्र धूमिल हो रहे हैँ, मूर्तियाँ खण्डित अवस्था में पडी हॅं तथा प्राचीन इमारतें उपेक्षा का शिकार हें यदि समय रहते इनके संरक्षण , पुनरुद्धार एवं वैज्ञानिक संवर्द्धन की दिशा में ठोस प्रयास नहीं किए गए॰ तो आने वाली पीढ़ियाँ इस गौरवशाली सांस्कृतिक विरासत से वंचित हो जाएँगी | अतः आवश्यक है कि पुरातत्व विभाग, स्थानीय प्रशासन, शोध संस्थान एवं समाज मिलकर तोरावाटी क्षेत्र की इन अमूल्य कलात्मक धरोहरों के संरक्षण हेतु गंभीर पहल करें | साथ ही इन स्थलों को पर्यटन एवं सांस्कृतिक अध्ययन से जोड़कर राष्टीय स्तर पर पहचान दिलाई जानी चाहिए। निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि तोरावाटी क्षेत्र को शिल्प एवं कला परम्परा राजस्थान की सांस्कृतिक चेतना का जीवंत दस्तावेज है। डॉ॰ महावीर प्रसाद शर्मा द्वारा प्रस्तुत ऐतिहासिक विवरण इस विरासत को समझने का एक महत्त्वपूर्ण  आधार प्रदान करता है।यह केवल अतीत का गौख नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के सांस्कृतिक संरक्षण का भी प्रेरक स्रोत है। इन्दौरिया समाचार जगत Editorial राजस्थान की सांस्कृतिक चेतना का जीवंत दस्तावेज तोरावाटी   क्षेत्र राजस्थान की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत করা एक गौरवशाली अध्याय है। यहाँ की शिल्पकला, स्थापत्य, मूर्तिकला एवं भित्ति- चित्रकला न केवल क्षेत्रीय इतिहास को अभिव्यक्त करती हें, बल्कि भारतीय परम्परा की उत्कृष्टता का भी परिचय देती हैं।लेखक डॉ. महावीर प्रसाद कला शर्मा द्वारा रचित तोरावाटी का इतिहास इस दृष्टि से एक महत्त्वपूर्ण एवं प्रामाणिक ग्रन्थ है, जिसमें क्षेत्र की सांस्कृतिक धरोहरों का T एव वर्णन प्रस्तुत किया गया है। तथ्यपरक गुप्तकालीन प्रभावों से दिखाई तोरावाटी को कला परम्परा का आरम्भ देता है। विराटनगर स्थित बीजक की पहाड़ी़ से प्राप्त बौद्ध-विहार एव स्थापत्य अवशेष उस युग की उच्च स्थापत्य परम्परा के जीवंत प्रमाण हैं। गुर्जर - प्रतिहार काल में इस क्षेत्र की मूर्तिकला ने विशेष  इसक उपरान्त उ्कष प्राप्त किया। राजोरगढ़, नीलकंठ तथा तालवृक्ष से प्राप्त प्रतिमाएँ तत्कालीन शिल्पकारों की अद्धृत कलात्मक दक्षता को प्रमाणित करती हैँ विशेष रूप से तालवृक्ष से प्राप्त वराह भगवान की विशाल प्रतिमा भारतीय मूर्तिकला की अनुपम धरोहर मानी जाती है।काले संगमरमर पर सूक्ष्मता से उकेरी गई यह प्रतिमा दर्शाती है कि उस समय तोरावाटी अत्यन्त क्षेत्र में मूर्तिकला कितनी विकसित एवं परिपक्व अवस्था में थी।इसी प्रकार अमाई, आसपुरा, बेवां तथा कोटपूतली क्षेत्र से प्राप्त यक्षी, वीर- पुरुष स्मारक एवं नृसिंहावतार की प्रतिमाएँ भी इस क्षेत्र की समृद्ध शिल्प परम्परा का परिचय देती हैं कला की दृष्टि से भी तोरावाटी अत्यन्त समृद्ध रहा है। स्थापत्य विराटनगर का श्वेताम्बर जैन मन्दिर, मनोहरपुर के बावनजी एवं चतुर्भुजजी कोटपूतली की प्राचीन छ्तरियाँ तथा विभिन्रन किले के मन्दिर, पाटन एवं राजपूतः मुगल एवं स्थानीय स्थापत्य शैलियों के सुन्दर समन्चय के उदाहरण हैं। इन इमारतों में प्रयुक्त शिल्प-सौन्दर्य तत्कालीन समाज की कलात्मक अभिरुचि एवं सांस्कृतिक समृद्धि को दर्शाता है। तोरावाटी की भित्ति- चित्रकला विशेष रूप से उल्लेखनीय है। विराटनगर  मुगलद्वार, नारायणपुर के संज्यानाथजी मन्दिर, भाँखरी की सती लषमा का छत्री, पाटन, प्रागपुरा एवं बनेठी की छ्तरियों में अंकित चित्र राजस्थान की चित्रकला परम्परा को नई ऊँचाइयाँ प्रदान करते हॅं। इन चित्रों में रामायण कृष्णलीला   समुद्रमंथन शिकार   दृश्य নথা महाभारत राजदरवार लोकजीवन का अत्यन्त सजीव चित्रण किया है। चित्रों में प्रयुक्त T चटकीले लाल, हरे एवं कत्थई रंग स्थानीय लोक- संस्कृति और सौन्दर्यबोध को अभिव्यक्त करते हैं कलाकृतियों का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि इनमें केवल इन धार्मिक आख्यान ही नहीं॰ बल्कि लोकजीवन सामाजिक परम्पराएँ लोकविश्वास एवं जन- संस्कृति भी प्रतिबिम्बित होती है। यही कारण है कि तोरावाटी की कला केवल सौन्दर्य का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक एव सांस्कृतिक इतिहास का भी महत्त्वपूर्ण स्रोत है। दुर्भाग्यवश आज इन अमूल्य धरोहरों का बड़ा भाग संरक्षण के अभाव में नष्ट होने की स्थिति में पहुँच चुका है। अनेक भित्ति- चित्र धूमिल हो रहे हैँ, मूर्तियाँ खण्डित अवस्था में पडी हॅं तथा प्राचीन इमारतें उपेक्षा का शिकार हें यदि समय रहते इनके संरक्षण , पुनरुद्धार एवं वैज्ञानिक संवर्द्धन की दिशा में ठोस प्रयास नहीं किए गए॰ तो आने वाली पीढ़ियाँ इस गौरवशाली सांस्कृतिक विरासत से वंचित हो जाएँगी | अतः आवश्यक है कि पुरातत्व विभाग, स्थानीय प्रशासन, शोध संस्थान एवं समाज मिलकर तोरावाटी क्षेत्र की इन अमूल्य कलात्मक धरोहरों के संरक्षण हेतु गंभीर पहल करें | साथ ही इन स्थलों को पर्यटन एवं सांस्कृतिक अध्ययन से जोड़कर राष्टीय स्तर पर पहचान दिलाई जानी चाहिए। निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि तोरावाटी क्षेत्र को शिल्प एवं कला परम्परा राजस्थान की सांस्कृतिक चेतना का जीवंत दस्तावेज है। डॉ॰ महावीर प्रसाद शर्मा द्वारा प्रस्तुत ऐतिहासिक विवरण इस विरासत को समझने का एक महत्त्वपूर्ण  आधार प्रदान करता है।यह केवल अतीत का गौख नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के सांस्कृतिक संरक्षण का भी प्रेरक स्रोत है। - 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