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#मेरे विचार #🙏 प्रेरणादायक विचार #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #🙏गीता ज्ञान🛕 #❤️जीवन की सीख
मेरे विचार - श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् II मर्मको न जानकर किये हुए अभ्याससे 3 श्रेष्ठ है; ज्ञानसे मुझ परमेश्वरके स्वरूपका ध्यान है और ध्यानसे भी सब कर्मोंके फलका त्याग२ श्रेष्ठ है; क्योंकि त्यागसे तत्काल ही परम शान्ति होती है Il १२ II अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च निर्ममो   निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी ।I सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यों मद्धक्तः स मे प्रियः Il जो पुरुप सब भूतोंमें द्वेपभावसे रहित, स्वार्थरहित सबका प्रेमी और हेतुरहित दयालु है तथा ममतासे रहित, अहंकारसे रहित, सुख-दुःखोंको प्राप्तिमें सम और क्षमावान् है अर्थात् अपराध करनेवालेको भी अभय देनेवाला है; तथा जो योगी निरन्तर संतुष्ट है॰ मन- इन्द्रियोंसहित शरीरको वशमें किये हुए है और  मुझमें किये हुए 7 दृढ़ निश्चयवाला है-वह अर्पण ತಳಣೆ' मन= बुद्धिवाला मेरा भक्त प्रिय है Il १३-१४ II मुझको २. कैवल भगवदर्थ कर्म करनेवाले पुरुपका भगवानूमें प्रेम और श्रद्धा तथा भगवानूका चिन्तन भी बना रहता है॰ इसलिये कहा   है। ध्यानसे " कर्मफलका 4a যোা श्रीमद्भगवढ्गीता अध्याय १२ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् II मर्मको न जानकर किये हुए अभ्याससे 3 श्रेष्ठ है; ज्ञानसे मुझ परमेश्वरके स्वरूपका ध्यान है और ध्यानसे भी सब कर्मोंके फलका त्याग२ श्रेष्ठ है; क्योंकि त्यागसे तत्काल ही परम शान्ति होती है Il १२ II अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च निर्ममो   निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी ।I सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यों मद्धक्तः स मे प्रियः Il जो पुरुप सब भूतोंमें द्वेपभावसे रहित, स्वार्थरहित सबका प्रेमी और हेतुरहित दयालु है तथा ममतासे रहित, अहंकारसे रहित, सुख-दुःखोंको प्राप्तिमें सम और क्षमावान् है अर्थात् अपराध करनेवालेको भी अभय देनेवाला है; तथा जो योगी निरन्तर संतुष्ट है॰ मन- इन्द्रियोंसहित शरीरको वशमें किये हुए है और  मुझमें किये हुए 7 दृढ़ निश्चयवाला है-वह अर्पण ತಳಣೆ' मन= बुद्धिवाला मेरा भक्त प्रिय है Il १३-१४ II मुझको २. कैवल भगवदर्थ कर्म करनेवाले पुरुपका भगवानूमें प्रेम और श्रद्धा तथा भगवानूका चिन्तन भी बना रहता है॰ इसलिये कहा   है। ध्यानसे " कर्मफलका 4a যোা श्रीमद्भगवढ्गीता अध्याय १२ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार - ShareChat