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#satnam waheguru ji #satnam shri waheguru ji #Meetha Lage Tera bhana
satnam waheguru ji - हरि सिमरनि कीओ सगल अकारा।। हरि सिमरन महि आपि निरंकाराII [5 मै तेरा भावः इस पूरी सृष्टि की उत्पत्ति, इसके समस्त आकार और रूप उस के हुकरुम से ही अस्तित्व में आए हैं। यानी यह सारा aHis பIICII भिखारी उसी की याद का ही एक मूर्त रूप है।परमात्मा अपनी रचना से अलग नहीं है। वह अपने सिमरन में, अपनी याद में और अपनी बनाई हुई जिओ 41" मौजूद है। जिस हृदय में उसका सिमरन चलता है, वहाँ स्चना वह निराकार प्रभु साक्षात प्रकट हो जाता हे।अक्सर हम समझते हें कि सिमरन केवल माला जपना हेः लेकिन गुरु साहिब कहते हैं कि यह पूरा पहाडा ब्रह्मांड ही परमात्मा के एक 'सिमरन। या उसके 'विचार' का परिणाम है। परमात्मा का कोई रूप नहीं है वह निराकार है लेकिन जब कोई নাল मनुष्य उसे सिमरन के जरिए याद करता है, तो वह निराकार प्रभु उस व्यक्ति के अनुभव में 'साकार' हो जाता हे। वह कहीं दूर नहीं, बल्कि बाबा सिमरन की अवस्था के भीतर ही समाया हुआ है। गुरु साहेब जी समझा रहे हैं कि जिसे तुम बाहर ढूंढ रहे हो, वह अपने सिमरन के रूप जी में इस पूरी कायनात में व्याप्त है। यदि तुम उस निराकार को पाना चाहते हो, तो 'हरि सिमरन' में लीन हो जाओ, क्योंकि वह स्वयं वहीं निवास करता हे।सिमरन वह कडी हे जो जीव को वापस उस मूल स्रोत से जोड़ देती है। हरि सिमरनि कीओ सगल अकारा।। हरि सिमरन महि आपि निरंकाराII [5 मै तेरा भावः इस पूरी सृष्टि की उत्पत्ति, इसके समस्त आकार और रूप उस के हुकरुम से ही अस्तित्व में आए हैं। यानी यह सारा aHis பIICII भिखारी उसी की याद का ही एक मूर्त रूप है।परमात्मा अपनी रचना से अलग नहीं है। वह अपने सिमरन में, अपनी याद में और अपनी बनाई हुई जिओ 41" मौजूद है। जिस हृदय में उसका सिमरन चलता है, वहाँ स्चना वह निराकार प्रभु साक्षात प्रकट हो जाता हे।अक्सर हम समझते हें कि सिमरन केवल माला जपना हेः लेकिन गुरु साहिब कहते हैं कि यह पूरा पहाडा ब्रह्मांड ही परमात्मा के एक 'सिमरन। या उसके 'विचार' का परिणाम है। परमात्मा का कोई रूप नहीं है वह निराकार है लेकिन जब कोई নাল मनुष्य उसे सिमरन के जरिए याद करता है, तो वह निराकार प्रभु उस व्यक्ति के अनुभव में 'साकार' हो जाता हे। वह कहीं दूर नहीं, बल्कि बाबा सिमरन की अवस्था के भीतर ही समाया हुआ है। गुरु साहेब जी समझा रहे हैं कि जिसे तुम बाहर ढूंढ रहे हो, वह अपने सिमरन के रूप जी में इस पूरी कायनात में व्याप्त है। यदि तुम उस निराकार को पाना चाहते हो, तो 'हरि सिमरन' में लीन हो जाओ, क्योंकि वह स्वयं वहीं निवास करता हे।सिमरन वह कडी हे जो जीव को वापस उस मूल स्रोत से जोड़ देती है। - ShareChat