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#जय माँ गायत्री जय गुरुवर
जय माँ गायत्री जय गुरुवर - श्रीमद् " भगवद्धीता अध्याय २, श्लोक ६३ - श्री भगवानुवाच क्रोधाद्धवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः| स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।I  विचार आसक्ति क्रोध इच्छ। ٢ श्रम नाश মুজ্স মীস্ত্র: क्रोध से विवेक खत्म होने लगता है विवेक खत्म होने से सही-गलत की पहचान मिट जाती है अंत में मनुष्य गलत निर्णय लेकर पतन की ओर चला जाता है जीवन संदेशः मन ही सबका मूल है - अगर हम बार॰बार किसी विषय के बारे में सोचते हैं तो धीरे धीरे उसमें फँस जाते हैं। इसलिए विचारों को नियंत्रित करना बहुत आवश्यक है। पूरा चक्र इस प्रकार है  | विचार > आसक्ति > इच्छा -> क्रोध > मोह > স্সূনি থম -> ব্রুষ্টি নাংা -> এনন श्रीहरि समूह श्रीमद् " भगवद्धीता अध्याय २, श्लोक ६३ - श्री भगवानुवाच क्रोधाद्धवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः| स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।I  विचार आसक्ति क्रोध इच्छ। ٢ श्रम नाश মুজ্স মীস্ত্র: क्रोध से विवेक खत्म होने लगता है विवेक खत्म होने से सही-गलत की पहचान मिट जाती है अंत में मनुष्य गलत निर्णय लेकर पतन की ओर चला जाता है जीवन संदेशः मन ही सबका मूल है - अगर हम बार॰बार किसी विषय के बारे में सोचते हैं तो धीरे धीरे उसमें फँस जाते हैं। इसलिए विचारों को नियंत्रित करना बहुत आवश्यक है। पूरा चक्र इस प्रकार है  | विचार > आसक्ति > इच्छा -> क्रोध > मोह > স্সূনি থম -> ব্রুষ্টি নাংা -> এনন श्रीहरि समूह - ShareChat