#पौराणिक कथा
' बालक ध्रुव '
राजा उत्तानपाद के पुत्र ध्रुव की है।
अपमान और संकल्प:
राजा उत्तानपाद की दो रानियाँ थीं—सुनीति (बड़ी) और सुरुचि (छोटी)। राजा सुरुचि को अधिक प्रेम करते थे। एक दिन जब 5 वर्षीय बालक ध्रुव अपने पिता की गोद में बैठने की कोशिश कर रहे थे, तब सुरुचि ने उन्हें खींचकर उतार दिया और अपमानित करते हुए कहा कि यदि उन्हें पिता की गोद और सिंहासन चाहिए, तो उन्हें भगवान की तपस्या कर उनके (सुरुचि के) गर्भ से जन्म लेना होगा।
कठोर तपस्या:
अपनी माँ सुनीति से प्रेरित होकर, ध्रुव भगवान विष्णु की खोज में वन चले गए। नारद मुनि ने उन्हें "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र की दीक्षा दी। ध्रुव ने केवल छ महीनों तक अत्यंत कठोर तपस्या की, जिससे विचलित होकर भगवान विष्णु उनके सामने प्रकट हुए।
वरदान और ध्रुव तारा:
जब विष्णु प्रकट हुए, तो ध्रुव इतने अभिभूत थे कि कुछ बोल नहीं पा रहे थे। भगवान ने अपने दिव्य शंख (पंचजन्य) से ध्रुव के गाल को छुआ, जिससे उन्हें दिव्य ज्ञान और वाणी प्राप्त हुई। ध्रुव की निष्काम भक्ति से प्रसन्न होकर, विष्णु ने उन्हें ब्रह्मांड में सर्वोच्च स्थान दिया, जिसे आज हम ध्रुव तारा के रूप में जानते हैं, जो अपनी जगह पर अडिग रहता है।
।। हरि ॐ नमो नारायणा ।।
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