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ध्यानमूलं गुरोमूर्ति: पूजामूलं गुरु: पदम् ।
मन्त्रमूलं गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरुः कृपा ॥४६॥
[ स्कन्दपुराण , गुरुगीता ३.४६ ]
अर्थात 👉🏻 ध्यान का केंद्र ( मूल ) गुरु की मूर्ति है ।
पूजा का मूल गुरु के चरण हैं । वास्तविक मन्त्र गुरु का उपदेश है ।
तथा मुक्ति/मोक्ष का मूल गुरु की करुणा/कृपा है ॥४६॥
*☝🏻साधना रहस्य –*
👉🏻 1√ ध्यान – गुरु का स्वरूप हृदय में धरें ~ बाह्य मूर्ति से मन एकाग्र ।
👉🏻 2√ पूजा – गुरु-चरणोदक , चरण-रज ही तीर्थ ~अहंकार गलता है ।
👉🏻 3√ मन्त्र – गुरु-मुख से मिला एक अक्षर भी `ब्रह्मास्त्र है`~ स्वरचित मन्त्र निष्फल ।
👉🏻 4√ मोक्ष/मुक्ति – शास्त्र , तप , योग सब व्यर्थ है यदि गुरु कृपा नहीं है ।
*😊 गुरु बिना ज्ञान नहीं , कृपा बिना मोक्ष/मुक्ति नहीं ।*
⚠️ निवेदन –
यह श्लोक गुरुगीता स्कन्दपुराण से है ।
गुरु मात्र देह नहीं , `तत्त्व` हैं । देह की पूजा नहीं , `बोध की पूजा` है ।
मूल शास्त्र ही परम् प्रमाण हैं । त्रुटि हेतु क्षमा 🙏🏻💐
नारायण
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☀️☀️ गुरुवार वंदन ☀️☀️
“गुरु कृपा हि केवलम्”
~सर्वज्ञ शङ्कर🚩


