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#मेरे विचार #🙏गीता ज्ञान🛕 #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #❤️जीवन की सीख #गीता
मेरे विचार - शरृणु मे भरतर्पभ सुखं त्विदानों त्रिविधं अथ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति Il परिणामेउमृतोपमम् " यत्तदग्रे चिपमिव तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मयुद्द्विप्रसादजम् ।।  हे भरतश्रेष्ठ ! अब तीन प्रकारके सुखको भी तू मुझसै सुन । जिस  सुखमें साशक मनुष्य भजन, ध्यान और सेवादिके अभ्याससे रमण करता है और जिससे दःखोंके अन्तको प्राप्त हा जाता है॰जो ऐसा सख आरम्भकालमैं यद्यपि विपके तुल्य प्रतीत९ रै, वह होता है॰ परन्तु परिणाममें अमृतके तुल्य हैं; इसलिये बुद्धिके प्रसादसे उत्पत्र होनेवाला  वर परमात्मविपयक সুত্ত মানিক কম্কা যমা * Il 38-3৩ Il विपयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेअमृतोपमम् परिणामे विपपिव तत्सुखं राजसं स्मृतम्। जो सुख विपय और इन्द्रियोंके संयोगसे होता वह पहले  भोगकालमें अमृतके तुल्य प्रतीत 8, होनेपर भौ परिणाममैं विपके हैः इसलिये तुल्य२  वह सुख राजस कहा गया हैं II ३८ ।I यदग्रे   चानुबन्धे मोहनमात्मनः च सुखं निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमदाहतम।। जो सुख भौगकालमें तथा परिणाममें भी आत्माको मोहित करनेवाला है॰वह निद्रा, आलस्य और प्रमादसे उत्पन्न सुख तामस कहा गया हैIl ३९ ।l १० जसे खेलर्मे आसक्तिवाले எ் faue7 ண मूठताके कारण प्रथप विपके तुल्य भासता ४॰ बैसै ढी विपयांपै  आसक्तिवाले परुपको भगवदूजन प्यानः सेवा आदि साधनाका अध्यास पर्प न जाननेके कारण प्रथप ' विपके तल्य प्रतीत ढोता ' ४| ಕೆ4ೆ ೊ उत्सार और परलाकका २० बल 47, नाशक रोनेसे ஏ் faqa ளளa इ्द्रियाके Hima और परिणामर्म विपके तुल्य " க 81 श्रीमढ्भगवढ्गीता अध्याय १८ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार शरृणु मे भरतर्पभ सुखं त्विदानों त्रिविधं अथ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति Il परिणामेउमृतोपमम् " यत्तदग्रे चिपमिव तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मयुद्द्विप्रसादजम् ।।  हे भरतश्रेष्ठ ! अब तीन प्रकारके सुखको भी तू मुझसै सुन । जिस  सुखमें साशक मनुष्य भजन, ध्यान और सेवादिके अभ्याससे रमण करता है और जिससे दःखोंके अन्तको प्राप्त हा जाता है॰जो ऐसा सख आरम्भकालमैं यद्यपि विपके तुल्य प्रतीत९ रै, वह होता है॰ परन्तु परिणाममें अमृतके तुल्य हैं; इसलिये बुद्धिके प्रसादसे उत्पत्र होनेवाला  वर परमात्मविपयक সুত্ত মানিক কম্কা যমা * Il 38-3৩ Il विपयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेअमृतोपमम् परिणामे विपपिव तत्सुखं राजसं स्मृतम्। जो सुख विपय और इन्द्रियोंके संयोगसे होता वह पहले  भोगकालमें अमृतके तुल्य प्रतीत 8, होनेपर भौ परिणाममैं विपके हैः इसलिये तुल्य२  वह सुख राजस कहा गया हैं II ३८ ।I यदग्रे   चानुबन्धे मोहनमात्मनः च सुखं निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमदाहतम।। जो सुख भौगकालमें तथा परिणाममें भी आत्माको मोहित करनेवाला है॰वह निद्रा, आलस्य और प्रमादसे उत्पन्न सुख तामस कहा गया हैIl ३९ ।l १० जसे खेलर्मे आसक्तिवाले எ் faue7 ண मूठताके कारण प्रथप विपके तुल्य भासता ४॰ बैसै ढी विपयांपै  आसक्तिवाले परुपको भगवदूजन प्यानः सेवा आदि साधनाका अध्यास पर्प न जाननेके कारण प्रथप ' विपके तल्य प्रतीत ढोता ' ४| ಕೆ4ೆ ೊ उत्सार और परलाकका २० बल 47, नाशक रोनेसे ஏ் faqa ளளa इ्द्रियाके Hima और परिणामर्म विपके तुल्य " க 81 श्रीमढ्भगवढ्गीता अध्याय १८ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार - ShareChat