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#❤️Love You ज़िंदगी ❤️
❤️Love You ज़िंदगी ❤️ - अध्याय २: अपमान की वो आग और स्वाभिमान का जन्म "मैं ११ १२ साल की रही होऊंगी। घर में किसी के यहाँ फंक्शन था और परिवार की सभी बड़ी बहनें सजन्धजकर वहाँ जाने की तैयारी कर रही थीं। वहां खाने (जिमाने) का भी प्रोग्राम था। बच्चों के लिए तो ऐसे फंक्शन किसी उत्सव से कम नहीं होते, मेरा मन भी मचल उठा। मैंने बड़े उत्साह से कहा, 'मैं भी आप लोगों के साथ चलूँगी!' सा़फ मना कर दिया। उन्होंने मुँह से तो कुछ नहीं लेकिन उन्होंने कहा, पर उनकी आँखों की वो झिझक और मना करने का तरीका मेरे कलेजे को चीर गया। मैं समझ गई थी कि उन्हें मेरे साथ चलने में शर्म आ रही थी। उन्हें लगता था कि मेरा काला रंग और मेरा रूप उनके बीच अच्छा नहीं लगेगा। उस दिन पहली बार मुझे अपने ही अपनों के बीच 'पराया' होने का गहरा अहसास हुआ। ' अध्याय २: अपमान की वो आग और स्वाभिमान का जन्म "मैं ११ १२ साल की रही होऊंगी। घर में किसी के यहाँ फंक्शन था और परिवार की सभी बड़ी बहनें सजन्धजकर वहाँ जाने की तैयारी कर रही थीं। वहां खाने (जिमाने) का भी प्रोग्राम था। बच्चों के लिए तो ऐसे फंक्शन किसी उत्सव से कम नहीं होते, मेरा मन भी मचल उठा। मैंने बड़े उत्साह से कहा, 'मैं भी आप लोगों के साथ चलूँगी!' सा़फ मना कर दिया। उन्होंने मुँह से तो कुछ नहीं लेकिन उन्होंने कहा, पर उनकी आँखों की वो झिझक और मना करने का तरीका मेरे कलेजे को चीर गया। मैं समझ गई थी कि उन्हें मेरे साथ चलने में शर्म आ रही थी। उन्हें लगता था कि मेरा काला रंग और मेरा रूप उनके बीच अच्छा नहीं लगेगा। उस दिन पहली बार मुझे अपने ही अपनों के बीच 'पराया' होने का गहरा अहसास हुआ। ' - ShareChat