ShareChat
click to see wallet page
search
#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-3️⃣9️⃣8️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः अर्जुन के द्वारा लक्ष्यवेध, द्रोण का ग्राह से छुटकारा और अर्जुन को ब्रह्मशिर नामक अस्त्र की प्राप्ति...(दिन 398) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ अर्जुनेनैवमुक्तस्तु द्रोणो हृष्टतनूरुहः । मुञ्चस्वेत्यब्रवीत् पार्थं स मुमोचाविचारयन् ।। ८ ।। अर्जुनके यों कहनेपर द्रोणाचार्यके शरीरमें (हर्षातिरेकसे) रोमांच हो आया और वे अर्जुनसे बोले, 'चलाओ बाण'! अर्जुनने बिना सोचे-विचारे बाण छोड़ दिया ।। ८ ।। ततस्तस्य नगस्थस्य क्षुरेण निशितेन च । शिर उत्कृत्य तरसा पातयामास पाण्डवः ।। ९ ।। फिर तो पाण्डुनन्दन अर्जुनने अपने चलाये हुए तीखे क्षुर नामक बाणसे वृक्षपर बैठे हुए उस गीधका मस्तक वेगपूर्वक काट गिराया ।। ९ ।। तस्मिन् कर्मणि संसिद्धे पर्यष्वजत पाण्डवम् । मेने च द्रुपदं संख्ये सानुबन्धं पराजितम् ।। १० ।। इस कार्यमें सफलता प्राप्त होनेपर आचार्यने अर्जुनको हृदयसे लगा लिया और उन्हें यह विश्वास हो गया कि राजा द्रुपद युद्धमें अर्जुनद्वारा अपने भाई-बन्धुओंसहित अवश्य पराजित हो जायेंगे ।। १० ।। कस्यचित् त्वथ कालस्य सशिष्योऽङ्गिरसां वरः । जगाम गङ्गामभितो मज्जितुं भरतर्षभ ।। ११ ।। भरतश्रेष्ठ ! तदनन्तर किसी समय आंगिरसवंशियोंमें उत्तम आचार्य द्रोण अपने शिष्योंके साथ गंगाजीमें स्नान करनेके लिये गये ।। ११ ।। अवगाढमथो द्रोणं सलिले सलिलेचरः । ग्राहो जग्राह बलवाञ्जङ्घान्ते कालचोदितः ।। १२ ।। वहाँ जलमें गोता लगाते समय कालसे प्रेरित हो एक बलवान् जलजन्तु ग्राहने द्रोणाचार्य की पिंडली पकड ली ।। १२ ।। स समर्थोऽपि मोक्षाय शिष्यान् सर्वानचोदयत् । ग्राहं हत्वा मोक्षयध्वं मामिति त्वरयन्निव ।। १३ ।। वे अपनेको छुड़ानेमें समर्थ होते हुए भी मानो हड़बड़ाये हुए अपने सभी शिष्योंसे बोले- 'इस ग्राह को मारकर मुझे बचाओ' ।। १३ ।। तद्वाक्यसमकालं तु बीभत्सुर्निशितैः शरैः । अवार्यैः पञ्चभिर्ग्रहं मग्नमम्भस्यताडयत् ।। १४ ।। उनके इस आदेशके साथ ही बीभत्सु (अर्जुन) ने पाँच अमोघ एवं तीखे बाणोंद्वारा पानीमें डूबे हुए उस ग्राहपर प्रहार किया ।। १४ ।। इतरे त्वथ सम्मूढास्तत्र तत्र प्रपेदिरे । तं तु दृष्ट्वा क्रियोपेतं द्रोणोऽमन्यत पाण्डवम् ।। १५ ।। विशिष्टं सर्वशिष्येभ्यः प्रीतिमांश्चाभवत् तदा । स पार्थबाणैर्बहुधा खण्डशः परिकल्पितः ।। १६ ।। ग्राहः पञ्चत्वमापेदे जङ्घां त्यक्त्वा महात्मनः । अथाब्रवीन्महात्मानं भारद्वाजो महारथम् ।। १७ ।। परंतु दूसरे राजकुमार हक्के-बक्के-से होकर अपने-अपने स्थानपर ही खड़े रह गये। अर्जुनको तत्काल कार्यमें तत्पर देख द्रोणाचार्यने उन्हें अपने सब शिष्योंसे बढ़कर माना और उस समय वे उनपर बहुत प्रसन्न हुए। अर्जुनके बाणोंसे ग्राहके टुकड़े-टुकड़े हो गये और वह महात्मा द्रोणकी पिंडली छोड़कर मर गया। तब द्रोणाचार्यने महारथी महात्मा अर्जुनसे कहा- ।। १५-१७ ।। गृहाणेदं महाबाहो विशिष्टमतिदुर्धरम् । अस्त्रं ब्रह्मशिरो नाम सप्रयोगनिवर्तनम् ।। १८ ।। 'महाबाहो ! यह ब्रह्मशिर नामक अस्त्र मैं तुम्हें प्रयोग और उपसंहारके साथ बता रहा हूँ। यह सब अस्त्रोंसे बढ़कर है तथा इसे धारण करना भी अत्यन्त कठिन है। तुम इसे ग्रहण करो' ।। १८ ।। न च ते मानुषेष्वेतत् प्रयोक्तव्यं कथंचन । जगद् विनिर्दहेदेतदल्पतेजसि पातितम् ।। १९ ।। 'मनुष्योंपर तुम्हें इस अस्त्रका प्रयोग किसी भी दशामें नहीं करना चाहिये। यदि किसी अल्प तेजवाले पुरुषपर इसे चलाया गया तो यह उसके साथ ही समस्त संसारको भस्म कर सकता है ।। १९ ।। असामान्यमिदं तात लोकेष्वस्त्रं निगद्यते। तद् धारयेथाः प्रयतः शृणु चेदं वचो मम ।। २० ।। 'तात! यह अस्त्र तीनों लोकोंमें असाधारण बताया गया है। तुम मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर इस अस्त्रको धारण करो और मेरी यह बात सुनो ।। २० ।। बाधेतामानुषः शत्रुर्यदि त्वां वीर कश्चन । तद्वधाय प्रयुञ्जीथास्तदस्त्रमिदमाहवे ।। २१ ।। 'वीर! यदि कोई अमानव शत्रु तुम्हें युद्धमें पीड़ा देने लगे तो तुम उसका वध करनेके लिये इस अस्त्रका प्रयोग कर सकते हो' ।। २१ ।। तथेति सम्प्रतिश्रुत्य बीभत्सुः स कृताञ्जलिः । जग्राह परमास्त्रं तदाह चैनं पुनर्गुरुः । भविता त्वत्समो नान्यः पुमॉल्लोके धनुर्धरः ।। २२ ।। तब अर्जुनने 'तथास्तु' कहकर वैसा ही करनेकी प्रतिज्ञा की और हाथ जोड़कर उस उत्तम अस्त्रको ग्रहण किया। उस समय गुरु द्रोणने अर्जुनसे पुनः यह बात कही- 'संसारमें दूसरा कोई पुरुष तुम्हारे समान धनुर्धर न होगा' ।। २२ ।। इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि द्रोणग्राहमोक्षणे द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १३२ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें द्रोणाचार्यका ग्राहसे छुटकारा नामक एक सौ बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १३२ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
महाभारत - श्रीमहाभारतम् श्रीमहाभारतम् - ShareChat