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#मेरे विचार #🙏 प्रेरणादायक विचार #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #🙏गीता ज्ञान🛕 #❤️जीवन की सीख
मेरे विचार - अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोपि मयि स्थिरम्। अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय ।। यदि तू मनको अचल स्थापन करनेके मुझमें लिये समर्थ नहीं है तो हे अर्जुन! अभ्यासरूपः योगके द्वारा मुझको प्राप्त होनेके लिये इच्छा कर II ९ II  अभ्यासेषप्यसमर्थोडसि मत्कर्मपरमो भव मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि तो यदि तू उपर्युक्त अभ्यासमें भी असमर्थ है 7 केवल मेरे लिये कर्म करनेके हो परायण२ हो इस प्रकार मैरे निमित्त कर्मोको करता हुआ भी प्राप्तिरूप सिद्धिको ही प्राप्त होगा II १० Il अथैतदप्यशक्तोउसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्पवान्।। यदि मेरी प्राप्तिरूप योगके आश्रित होकर उपर्युक्त মাঙনক্ষী ক্নেদ' সী বু অমসর্থ ষ নী সন-ব্রুভি आदिपर विजय प्राप्त करनेवाला होकर सब कर्मोके ক্লক্ষকা নযং কষযII ?? Il श्रवण, कोर्तन पनन तथा भगवानूके नाम और गुणोंका  8 श्वासके द्वारा जप और भगवत्प्राप्तिविपयक शास्त्रोंका पठन- पाठन इत्यादिक चेप्टार्एँ भगवत्प्राप्तिके लिये নানো करनका নাম সং্াম' ৮1 २. स्वार्थको त्यागकर तथा परमेश्वरको ही परम आश्रय और परमगति समझकर निप्काम प्रेमभावसे सती-शिरोमणि  पतित्रता स्त्रौको भौति मन॰ वाणी और शरीरद्वारा परमैश्वरकै ही लिये यज्ञ   दान और तपादि   सम्पूर्ण  कर्तव्यकर्मोके नाम करनका भगवदर्थ कर्म करनेके परायण होना " ४। गौता अध्याय ९ श्लोक २७ में इसका विस्तार देखना चाहिये। श्रीमद्भगवढ्गीता अध्याय १२ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोपि मयि स्थिरम्। अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय ।। यदि तू मनको अचल स्थापन करनेके मुझमें लिये समर्थ नहीं है तो हे अर्जुन! अभ्यासरूपः योगके द्वारा मुझको प्राप्त होनेके लिये इच्छा कर II ९ II  अभ्यासेषप्यसमर्थोडसि मत्कर्मपरमो भव मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि तो यदि तू उपर्युक्त अभ्यासमें भी असमर्थ है 7 केवल मेरे लिये कर्म करनेके हो परायण२ हो इस प्रकार मैरे निमित्त कर्मोको करता हुआ भी प्राप्तिरूप सिद्धिको ही प्राप्त होगा II १० Il अथैतदप्यशक्तोउसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्पवान्।। यदि मेरी प्राप्तिरूप योगके आश्रित होकर उपर्युक्त মাঙনক্ষী ক্নেদ' সী বু অমসর্থ ষ নী সন-ব্রুভি आदिपर विजय प्राप्त करनेवाला होकर सब कर्मोके ক্লক্ষকা নযং কষযII ?? Il श्रवण, कोर्तन पनन तथा भगवानूके नाम और गुणोंका  8 श्वासके द्वारा जप और भगवत्प्राप्तिविपयक शास्त्रोंका पठन- पाठन इत्यादिक चेप्टार्एँ भगवत्प्राप्तिके लिये নানো करनका নাম সং্াম' ৮1 २. स्वार्थको त्यागकर तथा परमेश्वरको ही परम आश्रय और परमगति समझकर निप्काम प्रेमभावसे सती-शिरोमणि  पतित्रता स्त्रौको भौति मन॰ वाणी और शरीरद्वारा परमैश्वरकै ही लिये यज्ञ   दान और तपादि   सम्पूर्ण  कर्तव्यकर्मोके नाम करनका भगवदर्थ कर्म करनेके परायण होना " ४। गौता अध्याय ९ श्लोक २७ में इसका विस्तार देखना चाहिये। श्रीमद्भगवढ्गीता अध्याय १२ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार - ShareChat