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त्रिशला ग्रुप #जैन धर्म : jain dharm #जैन तीर्थंकर भगवान #🙏जैन तीर्थंकर भगवान🪔 #🙏jain dharm 🙏 #🌺जय जिनेन्द्र🙏
जैन धर्म : jain dharm - श्रुतपंचमी पर्व का महत्व जैन शासन में श्रुत पंचमी पर्व सबसे महान पर्व में से एक है इस तिथि को तीर्थंकर भगवान के उपदेश को मौखिक रूप से परिवर्तित करके अक्षर के रूप में शास्त्रों में , जिनवाणी में लिखा गया থা होने के मार्ग का तीर्थंकर भगवान समवशरण में मोक्ष का मार्ग, सुखी उपदेश देते है जो विश्व कल्याणकारी होता है होने का कल्याणकारी मार्ग नष्ट ना हो जाए इस चिंता के कारण  सुखी आचार्य धरसेन को इसे लिखने (लिपिबद्ध करने) का विचार आया आचार्य धरसेन ने मौखिक उपदेश देकर आचार्य पुष्पदंत और आचार्य को इसे लिपि के माध्यम से लिखने को कहा भूतबली इन दोनों आचार्य के माध्यम से षटखंडागम ग्रंथ लिखना प्रारंभ हुआ, इसी तिथि को षटखंडागम ग्रंथ की रचना पूर्ण हुई थी षटखंडागम ग्रंथ के मंगलाचरण में ही णमोकार मंत्र पहली बार लिखा है तब से आज तक तीर्थंकर भगवान के उपदेश सिर्फ जिनवाणी में सुरक्षित है, जिनवाणी में ही तीर्थंकर भगवान के मुक्ति प्रदान करने वाले महान वचन है हमारे सौभाग्य से और धरसेन आचार्य के कारण २५५० वर्ष बाद भी हमे तीर्थंकर के उपदेश सही सलामत मिले है इसीलिए यह दिवस प्रत्येक जैन बंधु ने बड़े उत्साह से मनाना  चाहिए जिनवाणी में महान रहस्यमय जिनेंद्र भगवान का संदेश है इसे हमें पंचम काल के अंत तक पढ़ना है और संभाल कर रखना है साडे अठारह हजार साल तक यदि कोई भव्य जीव आए तो उसे जिनवाणी पढ़कर मुक्ति का मार्ग और सुखी होने का मार्ग मिले यही भावना से हमने जिनवाणी को सदैव पढ़ना, सुनना, पढ़ाना और धर्म का मर्म सरक्षित रखना चाहिए श्रुतपंचमी पर्व का महत्व जैन शासन में श्रुत पंचमी पर्व सबसे महान पर्व में से एक है इस तिथि को तीर्थंकर भगवान के उपदेश को मौखिक रूप से परिवर्तित करके अक्षर के रूप में शास्त्रों में , जिनवाणी में लिखा गया থা होने के मार्ग का तीर्थंकर भगवान समवशरण में मोक्ष का मार्ग, सुखी उपदेश देते है जो विश्व कल्याणकारी होता है होने का कल्याणकारी मार्ग नष्ट ना हो जाए इस चिंता के कारण  सुखी आचार्य धरसेन को इसे लिखने (लिपिबद्ध करने) का विचार आया आचार्य धरसेन ने मौखिक उपदेश देकर आचार्य पुष्पदंत और आचार्य को इसे लिपि के माध्यम से लिखने को कहा भूतबली इन दोनों आचार्य के माध्यम से षटखंडागम ग्रंथ लिखना प्रारंभ हुआ, इसी तिथि को षटखंडागम ग्रंथ की रचना पूर्ण हुई थी षटखंडागम ग्रंथ के मंगलाचरण में ही णमोकार मंत्र पहली बार लिखा है तब से आज तक तीर्थंकर भगवान के उपदेश सिर्फ जिनवाणी में सुरक्षित है, जिनवाणी में ही तीर्थंकर भगवान के मुक्ति प्रदान करने वाले महान वचन है हमारे सौभाग्य से और धरसेन आचार्य के कारण २५५० वर्ष बाद भी हमे तीर्थंकर के उपदेश सही सलामत मिले है इसीलिए यह दिवस प्रत्येक जैन बंधु ने बड़े उत्साह से मनाना  चाहिए जिनवाणी में महान रहस्यमय जिनेंद्र भगवान का संदेश है इसे हमें पंचम काल के अंत तक पढ़ना है और संभाल कर रखना है साडे अठारह हजार साल तक यदि कोई भव्य जीव आए तो उसे जिनवाणी पढ़कर मुक्ति का मार्ग और सुखी होने का मार्ग मिले यही भावना से हमने जिनवाणी को सदैव पढ़ना, सुनना, पढ़ाना और धर्म का मर्म सरक्षित रखना चाहिए - ShareChat