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#जय श्री कृष्ण भगवान श्रीकृष्ण की गोवर्धन लीला का अत्यंत गहरा और प्रतीकात्मक रूप प्रस्तुत करता है। कथा की शुरुआत – परंपरा पर प्रश्न.... ब्रज में वर्षों से लोग वर्षा के देवता इंद्र की पूजा करते थे, क्योंकि उनका विश्वास था कि जीवन और खेती उन्हीं की कृपा से चलती है। लेकिन बालक श्रीकृष्ण ने एक सरल प्रश्न उठाया— “क्या वास्तव में इंद्र ही सब कुछ देते हैं?” उन्होंने समझाया कि— गोवर्धन पर्वत ही हमें घास, जल, फल और आश्रय देता है। हमारी गायों और जीवन का पालन वही करता है इसलिए पूजा प्रकृति की होनी चाहिए, न कि अहंकार की। ' इंद्र का क्रोध और परीक्षा का समय ' जब ब्रजवासियों ने इंद्र पूजा छोड़कर गोवर्धन की पूजा शुरू की, तो इंद्र का अहंकार जाग उठा। उन्होंने क्रोधित होकर भयंकर वर्षा और तूफान भेज दिया— घर डूबने लगे, गायें और लोग संकट में आ गए। 'गोवर्धन धारण – दिव्य संरक्षण' तब श्रीकृष्ण ने अपनी छोटी उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठा लिया और सभी से कहा— “डरो मत, सब इसके नीचे आ जाओ।” सात दिन और सात रात तक सभी सुरक्षित रहे। अंततः इंद्र को अपनी भूल का एहसास हुआ। ' अहंकार का अंत ' इंद्र ने आकर श्रीकृष्ण से क्षमा मांगी और स्वीकार किया कि वे कोई साधारण बालक नहीं, बल्कि स्वयं परमात्मा हैं। चित्र का विशेष अर्थ – गोवर्धन = गौमाता इस चित्र में गोवर्धन पर्वत को गाय के रूप में दिखाया गया है, जो गहरे प्रतीक समेटे हुए है: पालन-पोषण का प्रतीक जैसे गौमाता दूध देती है, वैसे ही गोवर्धन जीवन देता है— घास, जल, अन्न और आश्रय। मुखारविंद का भाव गाय का मुख और जीभ उस स्थान को दर्शाते हैं जहाँ भक्त भोग अर्पित करते हैं। आज भी गोवर्धन में अन्नकूट चढ़ाने की परंपरा है। परिक्रमा का महत्व चित्र में चलते हुए लोग गोवर्धन परिक्रमा को दर्शाते हैं— यह श्रद्धा, समर्पण और प्रकृति से जुड़ने का प्रतीक है। गहरा संदेश यह कथा हमें सिखाती है— अहंकार का अंत निश्चित है। प्रकृति ही सच्ची पालनकर्ता है। भगवान सदैव अपने भक्तों की रक्षा करते हैं। प्रकृति स्वयं ईश्वर का रूप है। 'अन्नकूट और गोवर्धन पूजा...' आज भी गोवर्धन पूजा पर विभिन्न प्रकार के व्यंजन बनाकर अन्नकूट चढ़ाया जाता है। यह दिन प्रकृति और ईश्वर के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का पर्व है। सार : यह चित्र हमें याद दिलाता है... “जिस प्रकृति से जीवन मिलता है, वही ईश्वर का सजीव स्वरूप है।” और श्रीकृष्ण की यह लीला बताती है कि— सच्ची भक्ति में अपार शक्ति होती है, और ईश्वर हमेशा अपने भक्तों के साथ रहते हैं। श्री गिरिराज धरन की जय. राधे राधे.... जय श्रीराधेकृष्ण.... .
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