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2122 1212 22 रुख से उन के जब नकाब उतरा चाँद का बन के वो जवाब उतरा हर गली हर डगर थी ये चर्चा फिर जमी पे आज माहताब उतरा लहरा के झूम उठे मेरी बाहों में शर्मओ हया का जो हिजाब उतरा जुनूँ है , या सनक है मेरी कोई मेरी आँखों मे ऐसा ख्वाब उतरा जान ओ जिस्म तर बतर हुआ अश्क बन आँखों से आब उतरा चौट ऐसी लगी मेरे दिल पर इश्क का सर से मेरे ताब उतरा ( लक्ष्मण दावानी ✍ ) 22/10/2017 #📜मेरी कलम से✒️ #✒ शायरी #💝 शायराना इश्क़ #शायरी #📚कविता-कहानी संग्रह
📜मेरी कलम से✒️ - 1212 2122 22 रुख से उन के जब नकाब उतरा चाँद का बन केवो जवाब उतरा हर गली हर डगर थी ये चर्चा फिर जमी पे आज माहताब उतरा लहरा के झूम उठे मेरी बाहों में शर्मओ हया का जो हिजाब उतरा जुनूँ है , या सनक है मेरी कोई मेरी आँखों मे ऐसा ख्वाब उतरा जान ओ जिस्म q S3 बन आँखों सेआब उतरा अश्क चौट ऐसी लगी मेरे  दिल ٦ ব্ধা মং ম মং নান ওনয इश्क ( लक्ष्मण दावानी ८ ) 22/10/2017 1212 2122 22 रुख से उन के जब नकाब उतरा चाँद का बन केवो जवाब उतरा हर गली हर डगर थी ये चर्चा फिर जमी पे आज माहताब उतरा लहरा के झूम उठे मेरी बाहों में शर्मओ हया का जो हिजाब उतरा जुनूँ है , या सनक है मेरी कोई मेरी आँखों मे ऐसा ख्वाब उतरा जान ओ जिस्म q S3 बन आँखों सेआब उतरा अश्क चौट ऐसी लगी मेरे  दिल ٦ ব্ধা মং ম মং নান ওনয इश्क ( लक्ष्मण दावानी ८ ) 22/10/2017 - ShareChat