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।। ॐ ।। वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनञ्जयः। मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः॥ वृष्णिवंश में मैं वासुदेव अर्थात् सर्वत्र वास करनेवाला देव हूँ। पाण्डवों में मैं धनंजय हूँ। पुण्य ही पाण्डु है और आत्मिक सम्पत्ति ही स्थिर सम्पत्ति है। पुण्य से प्रेरित होकर आत्मिक सम्पत्ति को अर्जित करनेवाला धनंजय मैं हूँ। मुनियों में मैं व्यास हूँ। परमतत्त्व को व्यक्त करने की जिसमें क्षमता है, वह मुनि मैं हूँ। कवियों में उशना अर्थात् उसमें प्रवेश दिलानेवाला काव्यकार मैं हूँ। #❤️जीवन की सीख #🙏गुरु महिमा😇 #🧘सदगुरु जी🙏 #यथार्थ गीता #🙏🏻आध्यात्मिकता😇
❤️जीवन की सीख - 3 Il I वृष्णीनां वासुदेवोडस्मि पाण्डवानां धनजयः | मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः II में मैं वासुदेव अर्थात् वृष्णीवंश सर्वत्र वास करनेवाला देव हूँ। পাঞ্ভনী ম স এনতয ৪ুঁ पुण्य ही पाण्डु है और आत्मिक संम्पत्ति ही स्थिर संम्पत्ति है। पुण्य से प्रेरित होकर आत्मिक संम्पत्ति को अर्जित करनेवाला धनंजय मैं हूँ। में मैं व्यास हूँ मुनियों परमतव को व्यक्त करने की जिसमें क्षमता है, वह मुनि मैं हूँ । कवियों में उशना अर्थात् उसमें प्रवेश दिलानेवाला काव्यकार मैं 8/ मैं ही वह हूँ जो सर्वत्र है, जो धर्म में , ज्ञान में और काव्य में सत्य को प्रकट करता है। ज्ञान, धर्म और काव्य तीनों में मैं ही प्राण हूँ। 3 Il I वृष्णीनां वासुदेवोडस्मि पाण्डवानां धनजयः | मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः II में मैं वासुदेव अर्थात् वृष्णीवंश सर्वत्र वास करनेवाला देव हूँ। পাঞ্ভনী ম স এনতয ৪ুঁ पुण्य ही पाण्डु है और आत्मिक संम्पत्ति ही स्थिर संम्पत्ति है। पुण्य से प्रेरित होकर आत्मिक संम्पत्ति को अर्जित करनेवाला धनंजय मैं हूँ। में मैं व्यास हूँ मुनियों परमतव को व्यक्त करने की जिसमें क्षमता है, वह मुनि मैं हूँ । कवियों में उशना अर्थात् उसमें प्रवेश दिलानेवाला काव्यकार मैं 8/ मैं ही वह हूँ जो सर्वत्र है, जो धर्म में , ज्ञान में और काव्य में सत्य को प्रकट करता है। ज्ञान, धर्म और काव्य तीनों में मैं ही प्राण हूँ। - ShareChat