#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣9️⃣1️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः
द्रोण का द्रुपद से तिरस्कृत हो हस्तिनापुर में आना, राजकुमारों से उनकी भेंट, उनकी बीटा और अँगूठी को कुएँ में से निकालना एवं भीष्म का उन्हें अपने यहाँ सम्मानपूर्वक रखना...(दिन 391)
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आसीत् सख्यं द्विजश्रेष्ठ त्वया मेऽर्थनिबन्धनम् । न ह्यनाढ्यः सखाढ्यस्य नाविद्वान् विदुषः सखा ।। ६९ ।।
न शूरस्य सखा क्लीबः सखिपूर्वं किमिष्यते । न हि राज्ञामुदीर्णानामेवम्भूतैर्नरैः क्वचित् ।। ७० ।।
सख्यं भवति मन्दात्मन् श्रियाहीनैर्धनच्युतैः ।
नाश्रोत्रियः श्रोत्रियस्य नारथी रथिनः सखा ।। ७१ ।।
नाराजा पार्थिवस्यापि सखिपूर्व किमिष्यते । अहं त्वया न जानामि राज्यार्थे संविदं कृताम् ।। ७२ ।।
'द्विजश्रेष्ठ! तुम्हारे साथ पहले जो मेरी मित्रता थी, वह (साथ-साथ खेलने और अध्ययन करने आदि) स्वार्थको लेकर हुई थी। सच्ची बात यह है कि दरिद्र मनुष्य धनवान्का, मूर्ख विद्वान्का और कायर शूरवीरका सखा नहीं हो सकता; अतः पहलेकी मित्रताका क्या भरोसा करते हो? मन्दमते! बड़े-बड़े राजाओंकी तुम्हारे-जैसे श्रीहीन और निर्धन मनुष्योंके साथ कभी मित्रता हो सकती है? जो श्रोत्रिय नहीं है, वह श्रोत्रियका; जो रथी नहीं है, वह रथीका तथा जो राजा नहीं है, वह राजाका मित्र नहीं हो सकता। फिर तुम मुझे जीर्ण-शीर्ण मित्रताका स्मरण क्यों दिलाते हो? मैंने अपने राज्यके लिये तुमसे कोई प्रतिज्ञा की थी, इसका मुझे कुछ भी स्मरण नहीं है ।। ६९-७२ ।।
एकरात्रं तु ते ब्रह्मन् कामं दास्यामि भोजनम् ।
एवमुक्तस्त्वहं तेन सदारः प्रस्थितस्तदा ।। ७३ ।।
'ब्रह्मन् ! तुम्हारी इच्छा हो तो मैं तुम्हें एक रातके लिये अच्छी तरह भोजन दे सकता हूँ।' राजा द्रुपदके यों कहनेपर मैं पत्नी और पुत्रके साथ वहाँसे चल दिया ।। ७३ ।।
तां प्रतिज्ञां प्रतिज्ञाय यां कर्तास्म्यचिरादिव ।
द्रुपदेनैवमुक्तोऽहं मन्युनाभिपरिप्लुतः ।। ७४ ।।
चलते समय मैंने एक प्रतिज्ञा की थी, जिसे शीघ्र पूर्ण करूँगा। द्रुपदके द्वारा जो इस प्रकार तिरस्कारपूर्ण वचन मेरे प्रति कहा गया है, उसके कारण मैं क्षोभसे अत्यन्त व्याकुल हो रहा हूँ ।। ७४ ।।
अभ्यागच्छं कुरून् भीष्म शिष्यैरर्थी गुणान्वितैः । ततोऽहं भवतः कामं संवर्धयितुमागतः ।। ७५ ।।
इदं नागपुरं रम्यं ब्रूहि किं करवाणि ते ।
भीष्मजी! मैं गुणवान् शिष्योंके द्वारा अपने अभीष्टकी सिद्धि चाहता हुआ आपके मनोरथको पूर्ण करनेके लिये पंचालदेशसे कुरुराज्यके भीतर इस रमणीय हस्तिनापुर नगरमें आया हूँ। बताइये, मैं आपका कौन-सा प्रिय कार्य करूँ? ।। ७५३ ।।
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्तदा भीष्मो भारद्वाजमभाषत ।। ७६ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- द्रोणाचार्यके यों कहनेपर भीष्मने उनसे कहा ।। ७६ ।।
भीष्म उवाच
अपज्यं क्रियतां चापं साध्वस्त्रं प्रतिपादय।
भुङ्क्ष्व भोगान् भृशं प्रीतः पूज्यमानः कुरुक्षये ।। ७७ ।।
भीष्मजी बोले-विप्रवर ! अब आप अपने धनुषकी डोरी उतार दीजिये और यहाँ रहकर राजकुमारोंको धनुर्वेद एवं अस्त्र-शस्त्रोंकी अच्छी शिक्षा दीजिये। कौरवोंके घरमें सदा सम्मानित रहकर अत्यन्त प्रसन्नताके साथ मनोवांछित भोगोंका उपभोग कीजिये ।। ७७ ।।
कुरूणामस्ति यद् वित्तं राज्यं चेदं सराष्ट्रकम् ।
त्वमेव परमो राजा सर्वे च कुरवस्तव ।। ७८ ।।
कौरवोंके पास जो धन, राज्य-वैभव तथा राष्ट्र है, उसके आप ही सबसे बड़े राजा हैं। समस्त कौरव आपके अधीन हैं ।। ७८ ।।
यच्च ते प्रार्थितं ब्रह्मन् कृतं तदिति चिन्त्यताम् ।
दिष्ट्या प्राप्तोऽसि विप्रर्षे महान् मेऽनुग्रहः कृतः ।। ७९ ।।
ब्रह्मन् ! आपने जो माँग की है, उसे पूर्ण हुई समझिये। ब्रह्मर्षे! आप आये, यह हमारे लिये बड़े सौभाग्यकी बात है। आपने यहाँ पधारकर मुझपर महान् अनुग्रह किया है ।। ७९ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि भीष्मद्रोणसमागमे त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १३० ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें भीष्म-द्रोण-समागमविषयक एक सौ तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १३० ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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