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#☝ मेरे विचार
☝ मेरे विचार - लोभ का एक ही इलाज है, संतोष की वृत्ति को बढ़ाएं मनुष्य के छ्ह शत्रुओं में एक लोभ भी है। इसका अर्थ है अतिरिक्त लालसा, अनुचित की मांग। यह धन, पद, वस्तु शरीर- इन पर काम करता है। मोटे तौर पर लोभ और लालच एक ही हैं। छोटा ्सा फर्क ये है कि लोभ, यानी जो आपके पास है, उसको और बढ़ाएं। और লালন; যানী তী के पास है, उसे पाने की लालसा। लोभ का दूसरों एक ही इलाज है संतोष की वृत्ति को अधिक किया जाए। तुलसीदास जी ने प्रसंग लिखा है कि काकभुशंडि जी ने पक्षीराज गरुड़ को कहा, आप ही को मोह हो गया हो, ऐसा नहीं है। बड़े-बड़े मोह और लोभ में डूबे। ग्यानी तापस कबि कोबिद गुन आगार, केहि कै लोभ "೯ बिडंबना कीन्हि न संसार- इस संसार में कौन ज्ञानी, तपस्वी शूरवीर, कवि, विद्वान और का धाम है॰ जिसकी लोभ ने गुणों विडंबना यानी मिट्टीपलीत ना कौ हो। अगर हमने लोभ के साथ संतोष की वृत्ति को नहीं जोड़ा तो लोभ हमारे को अशांति में बदल पुरुषार्थ देगा। कर्म करते समय अशांत होंगे और फल मिलने के पश्चात भी बेचैन ही बने रहेंगे। - Facebook:Pt. Vijayshankar Mehta लोभ का एक ही इलाज है, संतोष की वृत्ति को बढ़ाएं मनुष्य के छ्ह शत्रुओं में एक लोभ भी है। इसका अर्थ है अतिरिक्त लालसा, अनुचित की मांग। यह धन, पद, वस्तु शरीर- इन पर काम करता है। मोटे तौर पर लोभ और लालच एक ही हैं। छोटा ्सा फर्क ये है कि लोभ, यानी जो आपके पास है, उसको और बढ़ाएं। और লালন; যানী তী के पास है, उसे पाने की लालसा। लोभ का दूसरों एक ही इलाज है संतोष की वृत्ति को अधिक किया जाए। तुलसीदास जी ने प्रसंग लिखा है कि काकभुशंडि जी ने पक्षीराज गरुड़ को कहा, आप ही को मोह हो गया हो, ऐसा नहीं है। बड़े-बड़े मोह और लोभ में डूबे। ग्यानी तापस कबि कोबिद गुन आगार, केहि कै लोभ "೯ बिडंबना कीन्हि न संसार- इस संसार में कौन ज्ञानी, तपस्वी शूरवीर, कवि, विद्वान और का धाम है॰ जिसकी लोभ ने गुणों विडंबना यानी मिट्टीपलीत ना कौ हो। अगर हमने लोभ के साथ संतोष की वृत्ति को नहीं जोड़ा तो लोभ हमारे को अशांति में बदल पुरुषार्थ देगा। कर्म करते समय अशांत होंगे और फल मिलने के पश्चात भी बेचैन ही बने रहेंगे। - Facebook:Pt. Vijayshankar Mehta - ShareChat