#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣7️⃣0️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
राजा पाण्डु की मृत्यु और माद्री का उनके साथ चितारोहण...(दिन 370)
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माद्युवाच
कुन्ती समर्था पुत्राणां योगक्षेमस्य धारणे । अस्या हि न समा बुद्ध्या यद्यपि स्यादरुन्धती ।। कुन्त्याश्च वृष्णयो नाथाः कुन्तिभोजस्तथैव च । नाहं त्वमिव पुत्राणां समर्था धारणे तथा ।। साहं भर्तारमन्वेष्ये अतृप्ता नन्वहं तथा । भर्तृलोकस्य तु ज्येष्ठा देवी मामनुमन्यताम् ।। धर्मज्ञस्य कृतज्ञस्य सत्यधर्मस्य धीमतः ।
पादौ परिचरिष्यामि तदायें ह्यनुमन्यताम् ।।
माद्रीने कहा-कुन्तीदेवी सभी पुत्रोंके योग-क्षेमके निर्वाहमें- पालन-पोषणमें समर्थ हैं। कोई भी स्त्री, चाहे वह अरुन्धती ही क्यों न हो, बुद्धिमें इनकी समानता नहीं कर सकती। वृष्णिवंशके लोग तथा महाराज कुन्तिभोज भी कुन्तीके रक्षक एवं सहायक हैं। बहिन ! पुत्रोंके पालन-पोषणकी शक्ति जैसी आपमें है, वैसी मुझमें नहीं है। अतः मैं पतिका ही अनुगमन करना चाहती हूँ। पतिके संयोग-सुखसे मेरी तृप्ति भी नहीं हुई है। अतः आप बड़ी महारानीसे मेरी प्रार्थना है कि मुझे पतिलोकमें जानेकी आज्ञा दें। मैं वहीं धर्मज्ञ, कृतज्ञ, सत्यप्रतिज्ञ और बुद्धिमान् पतिके चरणोंकी सेवा करूँगी। आर्ये! आप मेरी इस इच्छाका अनुमोदन करें।
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा महाराज मद्रराजसुता शुभा । ददौ कुन्त्यै यमौ माद्री शिरसाभिप्रणम्य च ।। अभिवाद्य ऋषीन् सर्वान् परिष्वज्य च पाण्डवान् । मूर्युपाघ्राय बहुशः पार्थानात्मसुतौ तथा ।। हस्ते युधिष्ठिरं गृह्य माद्री वाक्यमभाषत ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- महाराज ! यों कहकर मद्रदेशकी राजकुमारी सती-साध्वी माद्रीने कुन्तीको प्रणाम करके अपने दोनों जुड़वें पुत्र उन्हींको सौंप दिये। तत्पश्चात् उसने महर्षियोंको मस्तक नवाकर पाण्डवोंको हृदयसे लगा लिया और बारंबार कुन्तीके तथा अपने पुत्रोंके मस्तक सूंघकर युधिष्ठिरका हाथ पकड़कर कहा।
माद्युवाच
कुन्ती माता अहं धात्री युष्माकं तु पिता मृतः । युधिष्ठिरः पिता ज्येष्ठश्चतुर्णां धर्मतः सदा ।। वृद्धानुशासने सक्ताः सत्यधर्मपरायणाः । तादृशा न विनश्यन्ति नैव यान्ति पराभवम् ।। तस्मात् सर्वे कुरुध्वं वै गुरुवृत्तिमतन्द्रिताः ।।
माद्री बोली-बच्चो ! कुन्तीदेवी ही तुम सबोंकी असली माता हैं, मैं तो केवल दूध पिलानेवाली धाय थी। तुम्हारे पिता तो मर गये। अब बड़े भैया युधिष्ठिर ही धर्मतः तुम चारों भाइयोंके पिता हैं। तुम सब बड़े-बूढ़ों-गुरुजनोंकी सेवामें संलग्न रहना और सत्य एवं धर्मके पालनसे कभी मुँह न मोड़ना। ऐसा करनेवाले लोग कभी नष्ट नहीं होते और न कभी उनकी पराजय ही होती है। अतः तुम सब भाई आलस्य छोड़कर गुरुजनोंकी सेवामें तत्पर रहना।
वैशम्पायन उवाच
ऋषीणां च पृथायाश्च नमस्कृत्य पुनः पुनः । आयासकृपणा माद्री प्रत्युवाच पृथां तथा ।। धन्या त्वमसि वाष्र्णेयि नास्ति स्त्री सदृशी त्वया । वीर्य तेजश्च योगं च माहात्म्यं च यशस्विनाम् ।। कुन्ति द्रक्ष्यसि पुत्राणां पञ्चानाममितौजसाम् । ऋषीणां संनिधावेषां मया वागभ्युदीरिता ।। स्वर्ग दिदृक्षमाणाया ममैषा न वृथा भवेत् । आर्या चाप्यभिवाद्या च मम पूज्या च सर्वतः ।। ज्येष्ठा वरिष्ठा त्वं देवि भूषिता स्वगुणैः शुभैः । अभ्यनुज्ञातुमिच्छामि त्वया यादवनन्दिनि ।। धर्म स्वर्गं च कीर्ति च त्वत्कृतेऽहमवाप्नुयाम् । यथा तथा विधत्स्वेह मा च कार्षीर्विचारणाम् ।।
वैशम्पायनजीने कहा- राजन् ! तत्पश्चात् माद्रीने ऋषियों तथा कुन्तीको बारंबार नमस्कार करके, क्लेशसे क्लान्त होकर कुन्तीदेवीसे दीनतापूर्वक कहा - 'वृष्णिकुलनन्दिनि! आप धन्य हैं। आपकी समानता करनेवाली दूसरी कोई स्त्री नहीं है; क्योंकि आपको इन अमिततेजस्वी तथा यशस्वी पाँचों पुत्रोंके बल, पराक्रम, तेज, योगबल तथा माहात्म्य देखनेका सौभाग्य प्राप्त होगा। मैंने स्वर्गलोकमें जानेकी इच्छा रखकर इन महर्षियोंके समीप जो यह बात कही है, वह कदापि मिथ्या न हो। देवि! आप मेरी गुरु, वन्दनीया तथा पूजनीया हैं; अवस्थामें बड़ी तथा गुणोंमें भी श्रेष्ठ हैं। समस्त नैसर्गिक सद्गुण आपकी शोभा बढ़ाते हैं। यादवनन्दिनि! अब मैं आपकी आज्ञा चाहती हूँ। आपके प्रयत्नद्वारा जैसे भी मुझे धर्म, स्वर्ग तथा कीर्तिकी प्राप्ति हो, वैसा सहयोग आप इस अवसरपर करें। मनमें किसी दूसरे विचारको स्थान न दें'।
बाष्पसंदिग्धया वाचा कुन्त्युवाच यशस्विनी ।। अनुज्ञातासि कल्याणि त्रिदिवे संगमोऽस्तु ते । भर्चा सह विशालाक्षि क्षिप्रमद्यैव भामिनि ।। संगता स्वर्गलोके त्वं रमेथाः शाश्वतीः समाः ।।) राज्ञः शरीरेण सह ममापीदं कलेवरम् ।
दग्धव्यं सुप्रतिच्छन्नमेतदायें प्रियं कुरु ।। २९ ।।
तब यशस्विनी कुन्तीने बाष्पगद्गद वाणीमें कहा- 'कल्याणि! मैंने तुम्हें आज्ञा दे दी। विशाललोचने ! तुम्हें आज ही स्वर्गलोकमें पतिका समागम प्राप्त हो। भामिनि ! तुम स्वर्गमें पतिसे मिलकर अनन्त वर्षांतक प्रसन्न रहो।'
माद्री बोली-'मेरे इस शरीरको महाराजके शरीरके साथ ही अच्छी प्रकार ढँककर दग्ध कर देना चाहिये। बड़ी बहिन ! आप मेरा यह प्रिय कार्य कर दें ।। २९ ।।
दारकेष्वप्रमत्ता च भवेथाश्च हिता मम । अतोऽन्यन्न प्रपश्यामि संदेष्टव्यं हि किंचन ।। ३० ।।
'मेरे पुत्रोंका हित चाहती हुई सावधान रहकर उनका पालन-पोषण करें। इसके सिवा दूसरी कोई बात मुझे आपसे कहनेयोग्य नहीं जान पड़ती' ।। ३० ।।
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्त्वा तं चिताग्निस्थं धर्मपत्नी नरर्षभम् । मद्रराजसुता तूर्णमन्वारोहद् यशस्विनी ।। ३१ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! कुन्तीसे यह कहकर पाण्डुकी यशस्विनी धर्मपत्नी माद्री चिताकी आगपर रखे हुए नरश्रेष्ठ पाण्डुके शवके साथ स्वयं भी चितापर जा बैठी ।। ३१ ।।
(ततः पुरोहितः स्नात्वा प्रेतकर्मणि पारगः । हिरण्यशकलान्याज्यं तिलान् दधि च तण्डुलान् ।। उदकुम्भं सपरशुं समानीय तपस्विभिः । अश्वमेधाग्निमाहृत्य यथान्यायं समन्ततः ।। काश्यपः कारयामास पाण्डोः प्रेतस्य तां क्रियाम् ।।
तदनन्तर प्रेतकर्मके पारंगत विद्वान् पुरोहित काश्यपने स्नान करके सुवर्णखण्ड, घृत, तिल, दही, चावल, जलसे भरा घड़ा और फरसा आदि वस्तुओंको एकत्र करके तपस्वी मुनियोंद्वारा अश्वमेधकी अग्नि मँगवायी और उसे चारों ओरसे चितासे छुलाकर यथायोग्य शास्त्रीय विधिसे पाण्डुका दाह-संस्कार करवाया।
अहताम्बरसंवीतो भ्रातृभिः सहितोऽनघः । उदकं कृतवांस्तत्र पुरोहितमते स्थितः ।। अर्हतस्तस्य कृत्यानि शतशृङ्गनिवासिनः ।
तापसा विधिवच्चक्रुश्चारणा ऋषिभिः सह ।।)
भाइयोंसहित निष्पाप युधिष्ठिरने नूतन वस्त्र धारण करके पुरोहितकी आज्ञाके अनुसार जलांजलि देनेका कार्य पूरा किया। शतशृंगनिवासी तपस्वी मुनियों और चारणोंने आदरणीय राजा पाण्डुके परलोक-सम्बन्धी सब कार्य विधिपूर्वक सम्पन्न किये।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि पाण्डूपरमे चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १२४ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें पाण्डुके परलोकगमनविषयक एक सौ चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १२४ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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