#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣6️⃣2️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन की उत्पत्ति...(दिन 362)
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मृगव्याधश्च सर्पश्च निर्ऋतिश्च महायशाः ।
अजैकपादहिर्बुध्न्यः पिनाकी च परंतप ।। ६८ ।।
दहनोऽथेश्वरश्चैव कपाली च विशाम्पते । स्थाणुर्भगश्च भगवान् रुद्रास्तत्रावतस्थिरे ।। ६९ ।।
शत्रुदमन महाराज ! मृगव्याध और सर्प, महा-यशस्वी निर्ऋति एवं अजैकपाद, अहिर्बुध्य और पिनाकी, दहन तथा ईश्वर, कपाली एवं स्थाणु तथा भगवान् भग- ये ग्यारह रुद्र भी वहाँ आकाशमें आकर खड़े थे ।। ६८-६९ ।।
अश्विनी वसवश्चाष्टी मरुतश्च महाबलाः ।
विश्वेदेवास्तथा साध्यास्तत्रासन् परितः स्थिताः ।। ७० ।।
दोनों अश्विनीकुमार तथा आठों वसु, महाबली मरुद्गण एवं विश्वेदेवगण तथा साध्यगण वहाँ सब ओर विद्यमान थे ।। ७० ।।
कर्कोटकोऽथ सर्पश्च वासुकिश्च भुजङ्गमः । कश्यपश्चाथ कुण्डश्च तक्षकश्च महोरगः ।। ७१ ।।
आययुस्तपसा युक्ता महाक्रोधा महाबलाः । एते चान्ये च बहवस्तत्र नागा व्यवस्थिताः ।। ७२ ।।
कर्कोटक सर्प तथा वासुकि नाग, कश्यप और कुण्ड, महानाग और तक्षक-ये तथा और भी बहुत-से महाबली, महाक्रोधी और तपस्वी नाग वहाँ आकर खड़े थे ।। ७१-७२ ।।
तार्थ्यश्चारिष्टनेमिश्च गरुडश्चासितध्वजः ।
अरुणश्चारुणिश्चैव वैनतेया व्यवस्थिताः ।। ७३ ।।
तार्क्ष्य और अरिष्टनेमि, गरुड एवं असितध्वज, अरुण तथा आरुणि- विनताके ये पुत्र भी उस उत्सवमें उपस्थित थे ।। ७३ ।।
तांश्च देवगणान् सर्वास्तपः सिद्धा महर्षयः ।
विमानगिर्यग्रगतान् ददृशुर्नेतरे जनाः ।। ७४ ।।
वे सब देवगण विमान और पर्वतके शिखरपर खड़े थे। उन्हें तपः सिद्ध महर्षि ही देख पाते थे, दूसरे लोग नहीं ।। ७४ ।।
तद् दृष्ट्वा महदाश्चर्य विस्मिता मुनिसत्तमाः । अधिकां स्म ततो वृत्तिमवर्तन् पाण्डवान् प्रति ।। ७५ ।।
वह महान् आश्चर्य देखकर वे श्रेष्ठ मुनिगण बड़े विस्मयमें पड़े। तबसे पाण्डवोंके प्रति उनमें अधिक प्रेम और आदरका भाव पैदा हो गया ।। ७५ ।।
पाण्डुस्तु पुनरेवैनां पुत्रलोभान्महायशाः । वक्तुमैच्छद् धर्मपत्नीं कुन्ती त्वेनमथाब्रवीत् ।। ७६ ।।
तदनन्तर महायशस्वी राजा पाण्डु पुत्र-लोभसे आकृष्ट हो अपनी धर्मपत्नी कुन्तीसे फिर कुछ कहना चाहते थे, किंतु कुन्ती उन्हें रोकती हुई बोली- ।। ७६ ।।
नातश्चतुर्थं प्रसवमापत्स्वपि वदन्त्युत ।
अतः परं स्वैरिणी स्याद् बन्धकी पञ्चमे भवेत् ।। ७७ ।।
'आर्यपुत्र ! आपत्तिकालमें भी तीनसे अधिक चौथी संतान उत्पन्न करनेकी आज्ञा शास्त्रोंने नहीं दी है। इस विधिके द्वारा तीनसे अधिक चौथी संतान चाहनेवाली स्त्री स्वैरिणी होती है और पाँचवें पुत्रके उत्पन्न होनेपर तो वह कुलटा समझी जाती है ।। ७७ ।।
स त्वं विद्वन् धर्ममिममधिगम्य कथं नु माम् । अपत्यार्थ समुत्क्रम्य प्रमादादिव भाषसे ।। ७८ ।।
'विद्वन्! आप धर्मको जानते हुए भी प्रमादसे कहनेवालेके समान धर्मका लोप करके अब फिर मुझे संतानोत्पत्तिके लिये क्यों प्रेरित कर रहे हैं' ।। ७८ ।।
(पाण्डुरुवाच
एवमेतद् धर्मशास्त्रं यथा वदसि तत् तथा ।)
पाण्डुने कहा- प्रिये ! वास्तवमें धर्मशास्त्रका ऐसा ही मत है। तुम जो कुछ कहती हो, वह ठीक है।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि पाण्डवोत्पत्तौ द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १२२ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें पाण्डवोंकी उत्पत्तिविषयक एक सौ बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १२२ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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