Annu
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मुनिवर, मेरी कठोर वक्षस्थली से आपके चरणों को कष्ट तो नहीं हुआ?------
एक समय की बात है। अनेक महान ऋषि-मुनियों के बीच यह प्रश्न उठा कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश (शिव) में सर्वोच्च कौन हैं? इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए महर्षि भृगु को तीनों देवों की परीक्षा लेने का दायित्व सौंपा गया।
ब्रह्मा जी के पास
सबसे पहले महर्षि भृगु ब्रह्मलोक पहुँचे। उन्होंने ब्रह्मा जी को प्रणाम नहीं किया। ब्रह्मा जी उनके इस व्यवहार से क्रोधित हुए, क्योंकि भृगु उनके मानस पुत्र थे। किंतु माता सरस्वती के शांत करने पर उन्होंने अपना क्रोध रोक लिया। महर्षि भृगु समझ गए कि ब्रह्मा जी ने क्रोध पर नियंत्रण तो किया, परंतु क्रोध उत्पन्न हुआ था।
भगवान शिव के पास
इसके बाद महर्षि भृगु कैलाश पहुँचे। भगवान शिव बड़े प्रेम से उन्हें गले लगाने के लिए आगे बढ़े, परंतु भृगु ने उन्हें रोकते हुए कहा कि वे उनके स्पर्श के योग्य नहीं हैं। यह सुनकर भगवान शिव अत्यंत क्रोधित हो गए और अपना त्रिशूल उठा लिया। तभी माता पार्वती ने उन्हें शांत किया। महर्षि भृगु ने देखा कि यहाँ भी क्रोध प्रकट हुआ।
भगवान विष्णु के पास
अंत में महर्षि भृगु वैकुण्ठ पहुँचे। उस समय भगवान विष्णु माता लक्ष्मी की गोद में विश्राम कर रहे थे।
महर्षि भृगु बिना कुछ कहे सीधे भगवान विष्णु के समीप गए और उनकी छाती पर अपने चरण से प्रहार कर दिया।
भगवान विष्णु तुरंत उठकर खड़े हो गए। उन्होंने क्रोध या अपमान का कोई भाव नहीं दिखाया। इसके विपरीत वे महर्षि भृगु के चरणों में झुक गए और अत्यंत विनम्रता से बोले—
«"ऋषिवर! मेरी कठोर छाती से आपके कोमल चरणों को अवश्य चोट लगी होगी। कृपया मुझे क्षमा करें। आइए, मैं आपके चरण दबा दूँ।"»
ऐसा कहते हुए भगवान विष्णु ने महर्षि भृगु के चरण अपने हाथों में लेकर दबाने शुरू कर दिए। कहा जाता है कि उसी समय उन्होंने भृगु के चरण में स्थित अहंकार के प्रतीक "तीसरे नेत्र" का भी नाश कर दिया, जिससे उनका अहंकार समाप्त हो गया।
महर्षि भृगु की आँखों में आँसू आ गए। उन्हें अपनी भूल का गहरा पश्चाताप हुआ। वे भगवान विष्णु के चरणों में गिर पड़े और बोले—
«"प्रभु! आप ही सर्वोच्च हैं। आपके समान क्षमा, करुणा, दया और विनम्रता किसी में नहीं है।"»
इसके बाद महर्षि भृगु ऋषियों के पास लौटे और उन्होंने घोषित किया कि भगवान विष्णु ही सर्वोच्च हैं, क्योंकि वे अपमान होने पर भी क्रोध नहीं करते और सभी प्राणियों के प्रति करुणा रखते हैं।
इस कथा से मिलने वाली शिक्षा
- सच्ची महानता शक्ति में नहीं, विनम्रता में होती है।
- क्षमा और करुणा अहंकार से कहीं अधिक श्रेष्ठ हैं।
- ईश्वर का हृदय सभी के लिए प्रेम और दया से भरा होता है।
- भगवान विष्णु का आचरण हमें सिखाता है कि अपमान का उत्तर भी शांति, प्रेम और विनम्रता से दिया जा सकता है। #👏भगवान विष्णु😇 #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #viral #Daily ##morning
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