#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣9️⃣7️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः
अर्जुन के द्वारा लक्ष्यवेध, द्रोण का ग्राह से छुटकारा और अर्जुन को ब्रह्मशिर नामक अस्त्र की प्राप्ति...(दिन 397)
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वैशम्पायन उवाच
ततो धनंजयं द्रोणः स्मयमानोऽभ्यभाषत । त्वयेदानीं प्रहर्तव्यमेतल्लक्ष्यं विलोक्यताम् ।। १ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! तदनन्तर द्रोणाचार्यने अर्जुनसे मुसकराते हुए कहा- 'अब तुम्हें इस लक्ष्यका वेध करना है। इसे अच्छी तरह देख लो' ।। १ ।।
मद्वाक्यसमकालं ते मोक्तव्योऽत्र भवेच्छरः । वितत्य कार्मुकं पुत्र तिष्ठ तावन्मुहूर्तकम् ।। २ ।।
'मेरी आज्ञा मिलनेके साथ ही तुम्हें इसपर बाण छोड़ना होगा। बेटा! धनुष तानकर खड़े हो जाओ और दो घड़ी मेरे आदेशकी प्रतीक्षा करो' ।। २ ।।
एवमुक्तः सव्यसाची मण्डलीकृतकार्मुकः । तस्थौ भासं समुद्दिश्य गुरुवाक्यप्रचोदितः ।। ३ ।।
उनके ऐसा कहनेपर अर्जुनने धनुषको इस प्रकार खींचा कि वह मण्डलाकार (गोल) प्रतीत होने लगा। फिर वे गुरुकी आज्ञासे प्रेरित हो गीधकी ओर लक्ष्य करके खड़े हो गये ।। ३ ।।
मुहूर्तादिव तं द्रोणस्तथैव समभाषत । पश्यस्येनं स्थितं भासं द्रुमं मामपि चार्जुन ।। ४ ।।
मानो दो घड़ी बाद द्रोणाचार्यने उनसे भी उसी प्रकार प्रश्न किया- 'अर्जुन ! क्या तुम उस वृक्षपर बैठे हुए गीधको, वृक्षको और मुझे भी देखते हो?' ।। ४ ।।
पश्याम्येकं भासमिति द्रोणं पार्थोऽभ्यभाषत । न तु वृक्षं भवन्तं वा पश्यामीति च भारत ।। ५ ।।
जनमेजय ! यह प्रश्न सुनकर अर्जुनने द्रोणाचार्यसे कहा- 'मैं केवल गीधको देखता हूँ। वृक्ष को अथवा आपको नहीं देखता' ।। ५ ।।
ततः प्रीतमना द्रोणो मुहूर्तादिव तं पुनः । प्रत्यभाषत दुर्धर्षः पाण्डवानां महारथम् ।। ६ ।।
इस उत्तरसे द्रोणका मन प्रसन्न हो गया। मानो दो घड़ी बाद दुर्धर्ष द्रोणाचार्यने पाण्डव-महारथी अर्जुनसे फिर पूछा- ।। ६ ।।
भासं पश्यसि यद्येनं तथा ब्रूहि पुनर्वचः ।
शिरः पश्यामि भासस्य न गात्रमिति सोऽब्रवीत् ।। ७ ।।
'वत्स ! यदि तुम इस गीधको देखते हो तो फिर बताओ, उसके अंग कैसे हैं?' अर्जुन बोले- 'मैं गीधका मस्तकभर देख रहा हूँ, उसके सम्पूर्ण शरीर को नहीं' ।। ७ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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