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#महाभारत #श्रीमहाभारतकथा-3️⃣7️⃣9️⃣ श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️ ।। श्रीहरिः ।। * श्रीगणेशाय नमः * ।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।। (सम्भवपर्व) अष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः भीमसेन के न आने से कुन्ती आदि की चिन्ता, नागलोक से भीमसेन का आगमन तथा उनके प्रति दुर्योधन की कुचेष्टा...(दिन 379) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ वैशम्पायन उवाच ततस्ते कौरवाः सर्वे विना भीमं च पाण्डवाः । वृत्तक्रीडाविहारास्तु प्रतस्थुर्गजसाह्वयम् ।। १ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय ! तदनन्तर समस्त कौरव और पाण्डव क्रीड़ा और विहार समाप्त करके भीमसेनके बिना ही हस्तिनापुरकी ओर प्रस्थित हुए ।। १ ।। रथैर्गजैस्तथा चाश्वर्यानैश्चान्यैरनेकशः । ब्रुवन्तो भीमसेनस्तु यातो ह्यग्रत एव नः ।। २ ।। ततो दुर्योधनः पापस्तत्रापश्यन् वृकोदरम् । भ्रातृभिः सहितो हृष्टो नगरं प्रविवेश ह ।। ३ ।। रथ, हाथी, घोड़े तथा अन्य अनेक प्रकारकी सवारियोंद्वारा वहाँसे चलकर वे आपसमें यह कह रहे थे कि भीमसेन तो हमलोगोंसे आगे ही चले गये हैं। पापी दुर्योधनने भीमसेनको वहाँ न देखकर अत्यन्त प्रसन्न हो भाइयोंके साथ नगरमें प्रवेश किया ।। २-३ ।। युधिष्ठिरस्तु धर्मात्मा ह्याविदन् पापमात्मनि । स्वेनानुमानेन परं साधुं समनुपश्यति ।। ४ ।। राजा युधिष्ठिर धर्मात्मा थे, उनके पवित्र हृदयमें दुर्योधनके पापपूर्ण विचारका भानतक न हुआ। वे अपने ही अनुमानसे दूसरेको भी साधु ही देखते और समझते थे ।। ४ ।। सोऽभ्युपेत्य तदा पार्थो मातरं भ्रातृवत्सलः । अभिवाद्याब्रवीत् कुन्तीमम्ब भीम इहागतः ।। ५ ।। भाईपर स्नेह रखनेवाले कुन्तीनन्दन युधिष्टिर उस समय माताके पास पहुँचकर उन्हें प्रणाम करके बोले- 'माँ! भीमसेन यहाँ आया है क्या?' ।। ५ ।। क्व गतो भविता मातर्नेह पश्यामि तं शुभे । उद्यानानि वनं चैव विचितानि समन्ततः ।। ६ ।। तदर्थं न च तं वीरं दृष्टवन्तो वृकोदरम् । मन्यमानास्ततः सर्वे यातो नः पूर्वमेव सः ।। ७ ।। 'मातः! वह कहाँ गया होगा? शुभे! यहाँ भी तो मैं उसे नहीं देख रहा हूँ। वहाँ हमलोगोंने भीमसेनके लिये उद्यान और वनका कोना-कोना खोज डाला। फिर भी जब वीरवर भीम को हम देख न सके, तब सबने यही समझ लिया कि वह हमलोगोंसे पहले ही चला गया होगा ।। ६-७ ।। आगताः स्म महाभागे व्याकुलेनान्तरात्मना । इहागम्य क्व नु गतस्त्वया वा प्रेषितः क्व नु ।। ८ ।। 'महाभागे! हम उसके लिये अत्यन्त व्याकुल हृदयसे यहाँ आये हैं। यहाँ आकर वह कहीं चला गया? अथवा तुमने उसे कहीं भेजा है?' ।। ८ ।। कथयस्व महाबाहुं भीमसेनं यशस्विनि । न हि मे शुध्यते भावस्तं वीरं प्रति शोभने ।। ९ ।। 'यशस्विनि ! महाबाहु भीमसेन का पता बताओ। शोभने ! वीर भीमसेन के विषय में मेरा हृदय शंकित हो गया है ।। ९ ।। यतः प्रसुप्तं मन्येऽहं भीमं नेति हतस्तु सः । इत्युक्ता च ततः कुन्ती धर्मराजेन धीमता ।। १० ।। हा हेति कृत्वा सम्भ्रान्ता प्रत्युवाच युधिष्ठिरम् । न पुत्र भीमं पश्यामि न मामभ्येत्यसाविति ।। ११ ।। 'जहाँ मैं भीमसेन को सोया हुआ समझता था, वहीं किसी ने उसे मार तो नहीं डाला?' बुद्धिमान् धर्मराजके इस प्रकार पूछनेपर कुन्ती 'हाय-हाय' करके घबरा उठी और युधिष्ठिरसे बोली- 'बेटा! मैंने भीमको नहीं देखा है। वह मेरे पास आया ही नहीं ।। १०-११ ।। शीघ्रमन्वेषणे यत्नं कुरु तस्यानुजैः सह । इत्युक्त्वा तनयं ज्येष्ठं हृदयेन विदूयता ।। १२ ।। क्षत्तारमानाय्य तदा कुन्ती वचनमब्रवीत् । क्य गतो भगवन् क्षत्तर्भीमसेनो न दृश्यते ।। १३ ।। 'तुम अपने छोटे भाइयोंके साथ शीघ्र उसे ढूँढ़नेका प्रयत्न करो।' कुन्तीका हृदय पुत्रकी चिन्तासे व्यथित हो रहा था, उसने ज्येष्ठ पुत्र युधिष्ठिरसे उपर्युक्त बात कहकर विदुरजीको बुलवाया और इस प्रकार कहा- 'भगवन्! भीमसेन नहीं दिखायी देता, वह कहाँ चला गया? ।। १२-१३ ।। उद्यानान्निर्गताः सर्वे भ्रातरो भ्रातृभिः सह । तत्रैकस्तु महाबाहुर्भीमो नाभ्येति मामिह ।। १४ ।। 'उद्यानसे सब लोग अपने भाइयोंके साथ चलकर यहाँ आ गये, किंतु अकेला महाबाहु भीम अबतक मेरे पास लौटकर नहीं आया ! ।। १४ ।। क्रमशः... साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
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