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।। ॐ ।। अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः। भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः॥ अहिंसा अर्थात् अपने आत्मा को अधोगति में न पहुँचाने का आचरण, समता- जिसमें विषमता न हो, सन्तोष, तप- मनसहित इन्द्रियों को लक्ष्य के अनुरूप तपाना, दान अर्थात् सर्वस्व का समर्पण, भगवत्पथ में मान-अपमान का सहन- इस प्रकार प्राणियों के उपर्युक्त भाव मुझसे ही होते हैं। ये सभी भाव दैवी चिन्तन-पद्धति के लक्षण हैं। इनका अभाव ही आसुरी सम्पद् है। #❤️जीवन की सीख #🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🧘सदगुरु जी🙏 #यथार्थ गीता #🙏गुरु महिमा😇
❤️जीवन की सीख - 11 3స I1 अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोडयशः  "gafaలT: भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव अहिंसा अर्थात् अपने आत्मा को अधोगति में न पहुँचाने का आचरण , समता- जिसमें विषमता न हो, सन्तोष, तप- मनसहित इन्द्रियों को लक्ष्य के अनुरूप तपाना, दान अर्थात् सर्वस्व का समर्पण भगवत्पथ में मान-्अपमान का सहन- इस प्रकार प्राणियों के उपर्युक्त भाव मुझसे ही होते हैें।ये सभी भाव देवी चिन्तन पद्धति के लक्षण हें। इनका अभाव ही आसुरी सम्पदहे। 11 3స I1 अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोडयशः  "gafaలT: भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव अहिंसा अर्थात् अपने आत्मा को अधोगति में न पहुँचाने का आचरण , समता- जिसमें विषमता न हो, सन्तोष, तप- मनसहित इन्द्रियों को लक्ष्य के अनुरूप तपाना, दान अर्थात् सर्वस्व का समर्पण भगवत्पथ में मान-्अपमान का सहन- इस प्रकार प्राणियों के उपर्युक्त भाव मुझसे ही होते हैें।ये सभी भाव देवी चिन्तन पद्धति के लक्षण हें। इनका अभाव ही आसुरी सम्पदहे। - ShareChat