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#शिवलिंग दर्शन *शिवजी का प्रसाद खाने के बारे में निर्णय!!!* अक्सर कथावाचक बड़ा रस लेकर कहते हैं कि शिवजी का प्रसाद नहीं लेना चाहिए. आस्थावान दुविधा में होजाता है कि प्रसाद लें या न लें, खाएं या न खाएं. शिवजी भगवान हैं और उनका ही प्रसाद त्याज्य! बात समझ से परे लगती है.पूजा के बाद प्रसाद ग्रहण करना स्वभाविक और उत्तम क्रिया की परिपाटी है. फिर शिवजी के लिए ही यह प्रतिबन्ध क्यों? अस्तु, अपनी तरफ से न तो कोई तर्क न टिप्पणी मूल शिवपुराण की बात श्लोकों के अर्थ के साथ प्रस्तुत है, निर्णय आप करें कि शिवजी का नैवेद्य लेना चाहिए या नहीं? अग्राह्यं शिवनैवेद्यमिति पूर्वं श्रुतं वचः । ब्रूहि तन्निर्णयं बिल्वमाहात्म्यमपि सन्मुने ॥ ऋषिगण बोले- हे महामुने ! हमने पहले सुना है कि भगवान् शिवको अर्पित किया गया नैवेद्य अग्राह्य होता है, अतएव नैवेद्यके विषयमें निर्णय और बिल्वपत्रका माहात्म्य भी कहिये ॥ १ ॥ सूत उवाच शृणुध्वं मुनयः सर्वे सावधानतयाधुना । सर्वं वदामि सम्प्रीत्या धन्या यूयं शिवव्रताः ॥2।। शिवभक्तः शुचिः शुद्धः सद्व्रती दृढनिश्चयः । भक्षयेच्छिवनैवेद्यं त्यजेदग्राह्यभावनाम् ॥ ३।। दृष्ट्वापि शिवनैवेद्यं यान्ति पापानि दूरतः । भुक्ते तु शिवनैवेद्ये पुण्यान्यायान्ति कोटिशः ॥ ४।। अलं यागसहस्त्रेणाप्यलं यागार्बुदैरपि । भक्षिते शिवनैवेद्ये शिवसायुज्यमाप्नुयात् ॥५।। यद्गृहे शिवनैवेद्यप्रचारोऽपि प्रजायते। तद्गृहं पावनं सर्वमन्यपावनकारणम्।। ६।। आगतं शिवनैवेद्यं गृहीत्वा शिरसा मुदा । भक्षणीयं प्रयत्नेन शिवस्मरणपूर्वकम् ॥७।। आगतं शिवनैवेद्यमन्यदा ग्राह्यमित्यपि। विलम्बे पापसम्बन्धो भवत्येव हि मानवः ॥८।। न यस्य शिवनैवेद्ये ग्रहणेच्छा प्रजायते । स पापिष्ठः गरिष्ठः स्यान्नरकं यात्यपि ध्रुवम् ॥९।। सूतजी बोले- हे मुनियो ! अब आप सब सावधानीसे सुनें। मैं प्रेमपूर्वक सब कुछ कह रहा हूँ। आप लोग शिवव्रत धारण करनेवाले हैं, अतः आपलोग धन्य हैं ॥ २ ॥ जो शिवका भक्त, पवित्र, शुद्ध, सव्रती तथा दृढ़निश्चयी है, उसे शिवनैवेद्य अवश्य ग्रहण करना चाहिये और अग्राह्य भावनाका त्याग कर देना चाहिये ॥ ३ ॥ शिवनैवेद्यको देखनेमात्रसे ही सभी पाप दूर हो जाते हैं और शिवका नैवेद्य भक्षण करनेसे तो करोड़ों पुण्य स्वतः आ जाते हैं ॥ ४॥ हजार यज्ञोंकी बात कौन कहे, अर्बुद यज्ञ करनेसे भी वह पुण्य प्राप्त नहीं हो पाता है, जो शिवनैवेद्य खानेसे प्राप्त हो जाता है। शिवका नैवेद्य खानेसे तो शिवसायुज्यकी प्राप्ति भी हो जाती है ॥ ५ ॥ जिस घरमें शिवको नैवेद्य लगाया जाता है या अन्यत्रसे शिवको समर्पित नैवेद्य प्रसादरूपमें आ जाता है, वह घर पवित्र हो जाता है और वह अन्यको भी पवित्र करनेवाला हो जाता है ॥ ६ ॥ आये हुए शिवनैवेद्यको प्रसन्नतापूर्वक सिर झुकाकर ग्रहण करके भगवान् शिवका स्मरण करते हुए उसे खा लेना चाहिये ॥ ७ ॥ आये हुए शिवनैवेद्यको दूसरे समयमें ग्रहण करूँगा-ऐसी भावना करके जो मनुष्य उसे ग्रहण करनेमें विलम्ब करता है, उसे पाप लगता है ॥ ८॥ जिसमें शिवनैवेद्य ग्रहण करनेकी इच्छा उत्पन्न नहीं होती, वह महान् पापी होता है और निश्चित रूपसे नरकको जाता है ॥ ९ ॥ हृदये चन्द्रकान्ते च स्वर्णरूप्यादिनिर्मिते । शिवदीक्षावता भक्तेनेदं भक्ष्यमितीर्यते ॥ १०।। शिवदीक्षान्वितो भक्तो महाप्रसादसंज्ञकम् । सर्वेषामपि लिङ्गानां नैवेद्यं भक्षयेच्छुभम् ॥ ११।। हृदयमें अवस्थित शिवलिंग या चन्द्रकान्तमणिसे बने हुए शिवलिंग अथवा स्वर्ण या चाँदीसे बनाये गये शिवलिंगको समर्पित किया गया नैवेद्य शिवकी दीक्षा लिये भक्तको खाना ही चाहिये-ऐसा कहा गया है ॥ १० ॥ इतना ही नहीं शिवदीक्षित भक्त समस्त शिवलिंगोंके लिये समर्पित महाप्रसादरूप शुभशिवनैवेद्यको खा सकता है ॥ ११ ॥ अन्यदीक्षायुजां नृणां शिवभक्तिरतात्मनाम्। श्रणुध्वं निर्णयं प्रीत्या शिवनैवेद्यभक्षणे ॥ १२।। शालग्रामोद्भवे लिङ्गे रसलिङ्गे तथा द्विजाः । पाषाणे राजते स्वर्णे सुरसिद्धप्रतिष्ठिते ॥ १३।। काश्मीरे स्फाटिके रात्ने ज्योतिर्लिङ्गेषु सर्वशः । चान्द्रायणसमं प्रोक्तं शम्भोनैवेद्यभक्षणम् ॥ १४।। ब्रह्महापि शुचिर्भूत्वा निर्माल्यं यस्तु धारयेत्। भक्षयित्वा द्रुतं तस्य सर्वपापं प्रणश्यति ॥ १५।। चण्डाधिकारो यत्रास्ति तद्भोक्तव्यं न मानवैः । चण्डाधिकारो नो यत्र भोक्तव्यं तच्च भक्तितः ॥ १६ बाणलिङ्गे च लौहे च सिद्धे लिङ्गे स्वयम्भुवि । प्रतिमासु च सर्वासु न चण्डोऽधिकृतो भवेत् ॥ १७।। स्नापयित्वा विधानेन यो लिङ्गस्नपनोदकम् । त्रिः पिबेत्त्रिविधं पापं तस्येहाशु विनश्यति ॥ १८।। अग्ग्राह्यं शिवनैवेद्यं पत्रं पुष्पं फलं जलम् । शालग्रामशिलासङ्गात्सर्वं याति पवित्रताम् ॥ १९।। लिङ्गोपरि च यद् द्रव्यं तदग्राह्यं मुनीश्वराः । सुपवित्रं च तज्ज्ञेयं यल्लिङ्गस्पर्शबाह्यतः ॥ २०।। नैवेद्यनिर्णयः प्रोक्त इत्थं वो मुनिसत्तमाः ।२१।। जिन मनुष्योंने अन्य देवोंकी दीक्षा ली है और शिवकी भक्तिमें वे अनुरक्त रहते हैं, उनके लिये शिवनैवेद्यके भक्षणके विषयमें निर्णयको प्रेमपूर्वक आप सब सुनें ॥ १२ ॥ हे ब्राह्मणो ! शालग्राममें उत्पन्न शिवलिंग, रसलिंग (पारदलिंग), पाषाणलिंग, रजतलिंग, स्वर्णलिंग, देवों और सिद्ध मुनियोंके द्वारा प्रतिष्ठित शिवलिंग, केसरके बने हुए लिंग, स्फटिकलिंग, रत्नलिंग और ज्योतिर्लिंग आदि समस्त शिवलिंगोंके लिये समर्पित नैवेद्यका भक्षण करना चान्द्रायण व्रतके समान फल देनेवाला कहा गया है ॥ १३-१४॥ यदि ब्रह्महत्या करनेवाला भी पवित्र होकर शिवका पवित्र निर्माल्य धारण करता है और उसे खाता है, उसके सम्पूर्ण पाप शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं ॥ १५ ॥ जहाँ चण्डका अधिकार हो, वहाँ शिवलिंगके लिये समर्पित नैवेद्यका भक्षण मनुष्योंको नहीं करना चाहिये; जहाँ चण्डका अधिकार न हो, वहाँ भक्तिपूर्वक भक्षण करना चाहिये ॥ १६ ॥ बाणलिंग, लौहलिंग, सिद्धलिंग, स्वयम्भूलिंग और अन्य समस्त प्रतिमाओंमें चण्डका अधिकार नहीं होता है ॥ १७ ॥ जो विधिपूर्वक शिवलिंगको स्नान कराकर उस स्नानजलको तीन बार पीता है, उसके समस्त पाप शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं ॥ १८ ॥ [चण्डके द्वारा अधिकृत होनेके कारण] अग्राह्य शिवनैवेद्य पत्र-पुष्प-फल और जल-यह सब शालग्रामशिलाके स्पर्शसे पवित्र हो जाता है ॥ १९ ॥ हे मुनीश्वरो ! शिवलिंगके ऊपर जो भी द्रव्य चढ़ाया जाता है, वह अग्राह्य है और जो लिंगके स्पर्शसे बाहर है, उसे अत्यन्त पवित्र जानना चाहिये ॥ २० ॥ हे मुनिश्रेष्ठो ! इस प्रकार मैंने शिवनैवेद्यका निर्णय कह दिया। शिवपुराण, विद्येश्वरसंहिता, अध्याय 22.
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