#महाभारत
#श्रीमहाभारतकथा-3️⃣5️⃣7️⃣
श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।
(सम्भवपर्व)
द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन की उत्पत्ति...(दिन 357)
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वैशम्पायन उवाच
संवत्सरधृते गर्भे गान्धार्या जनमेजय । आह्वयामास वै कुन्ती गर्भार्थे धर्ममच्युतम् ।। १ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! जब गान्धारीको गर्भ धारण किये एक वर्ष बीत गया, उस समय कुन्तीने गर्भ धारण करनेके लिये अच्युतस्वरूप भगवान् धर्मका आवाहन किया ।। १ ।।
सा बलिं त्वरिता देवी धर्मायोपजहार ह।
जजाप विधिवज्जप्यं दत्तं दुर्वाससा पुरा ।। २ ।।
देवी कुन्ती ने बड़ी उतावली के साथ धर्मदेवताके लिये पूजाके उपहार अर्पित किये। तत्पश्चात् पूर्वकालमें महर्षि दुर्वासाने जो मन्त्र दिया था, उसका विधिपूर्वक जप किया ।। २ ।।
आजगाम ततो देवो धर्मो मन्त्रबलात् ततः । विमाने सूर्यसंकाशे कुन्ती यत्र जपस्थिता ।। ३ ।।
तब मन्त्र बल से आकृष्ट हो भगवान् धर्म सूर्य के समान तेजस्वी विमान पर बैठकर उस स्थान पर आये, जहाँ कुन्तीदेवी जपमें लगी हुई थीं ।। ३ ।।
विहस्य तां ततो ब्रूयाः कुन्ति किं ते ददाम्यहम् । सा तं विहस्यमानापि पुत्रं देह्यब्रवीदिदम् ।। ४ ।।
तब धर्म ने हँसकर कहा- 'कुन्ती! बोलो, तुम्हें क्या दूँ?' धर्म के द्वारा हास्य पूर्वक इस प्रकार पूछने पर कुन्ती बोली- 'मुझे पुत्र दीजिये' ।। ४ ।
संयुक्ता सा हि धर्मेण योगमूर्तिधरेण ह । लेभे पुत्रं वरारोहा सर्वप्राणभृतां हितम् ।। ५ ।।
तदनन्तर योगमूर्ति धारण किये हुए धर्मके साथ समागम करके सुन्दरांगी कुन्तीने एक ऐसा पुत्र प्राप्त किया, जो समस्त प्राणियोंका हित करनेवाला था ।। ५ ।।
ऐन्द्रे चन्द्रसमायुक्ते मुहूर्तेऽभिजितेऽष्टमे । दिवामध्यगते सूर्ये तिथौ पूर्णेऽतिपूजिते ।। ६ ।।
समृद्धयशसं कुन्ती सुषाव प्रवरं सुतम् । जातमात्रे सुते तस्मिन् वागुवाचाशरीरिणी ।। ७ ।।
तदनन्तर जब चन्द्रमा ज्येष्ठा नक्षत्रपर थे, सूर्य तुला राशिपर विराजमान थे, शुक्ल पक्षकी 'पूर्णा' नामवाली पञ्चमी तिथि थी और अत्यन्त श्रेष्ठ अभिजित् नामक आठवाँ मुहूर्त विद्यमान था; उस समय कुन्तीदेवीने एक उत्तम पुत्रको जन्म दिया, जो महान् यशस्वी था। उस पुत्रके जन्म लेते ही आकाशवाणी हुई ।। ६-७ ।।
एष धर्मभृतां श्रेष्ठो भविष्यति नरोत्तमः । विक्रान्तः सत्यवाक् त्वेव राजा पृथ्व्यां भविष्यति ।। ८ ।।
युधिष्ठिर इति ख्यातः पाण्डोः प्रथमजः सुतः । भविता प्रथितो राजा त्रिषु लोकेषु विश्रुतः ।। ९ ।।
यशसा तेजसा चैव वृत्तेन च समन्वितः ।
'यह श्रेष्ठ पुरुष धर्मात्माओंमें अग्रगण्य होगा और इस पृथ्वीपर पराक्रमी एवं सत्यवादी राजा होगा। पाण्डुका यह प्रथम पुत्र 'युधिष्ठिर' नामसे विख्यात हो तीनों लोकोंमें प्रसिद्धि एवं ख्याति प्राप्त करेगा; यह यशस्वी, तेजस्वी तथा सदाचारी होगा' ।। ८-९३ ।।
धार्मिकं तं सुतं लब्ध्वा पाण्डुस्तां पुनरब्रवीत् ।। १० ।।
उस धर्मात्मा पुत्र को पाकर राजा पाण्डुने पुनः (आग्रहपूर्वक) कुन्ती से कहा ।। १० ।।
प्राहुः क्षत्रं बलज्येष्ठं बलज्येष्ठं सुतं वृणु ।
(अश्वमेधः क्रतुश्रेष्ठो ज्योतिश्श्रेष्ठो दिवाकरः । ब्राह्मणो द्विपदां श्रेष्ठो बलश्रेष्ठस्तु मारुतः ।। मारुतं मरुतां श्रेष्ठं सर्वप्राणिभिरीडितम् । आवाहय त्वं नियमात् पुत्रार्थं वरवर्णिनि ।। स नो यं दास्यति सुतं स प्राणबलवान् नृषु ।)
ततस्तथोक्ता भर्त्रा तु वायुमेवाजुहाव सा ।। ११ ।।
'प्रिये! क्षत्रियको बलसे ही बड़ा कहा गया है। अतः एक ऐसे पुत्रका वरण करो, जो बलमें सबसे श्रेष्ठ हो। जैसे अश्वमेध सब यज्ञोंमें श्रेष्ठ है, सूर्यदेव सम्पूर्ण प्रकाश करनेवालोंमें प्रधान हैं और ब्राह्मण मनुष्योंमें श्रेष्ठ है, उसी प्रकार वायुदेव बलमें सबसे बढ़-चढ़कर हैं। अतः सुन्दरी ! अबकी बार तुम पुत्र-प्राप्तिके उद्देश्यसे समस्त प्राणियोंद्वारा प्रशंसित देवश्रेष्ठ वायुका विधिपूर्वक आवाहन करो। वे हमलोगों के लिये जो पुत्र देंगे, वह मनुष्यों में सबसे अधिक प्राणशक्ति से सम्पन्न और बलवान् होगा।' स्वामी के इस प्रकार कहने पर कुन्ती ने तब वायुदेवका ही आवाहन किया ।। ११ ।।
ततस्तामागतो वायुर्मृगारूढो महाबलः ।
किं ते कुन्ति ददाम्यद्य ब्रूहि यत् ते हृदि स्थितम् ।। १२ ।।
तब महाबली वायु मृगपर आरूढ़ हो कुन्तीके पास आये और यों बोले- 'कुन्ती ! तुम्हारे मनमें जो अभिलाषा हो, वह कहो। मैं तुम्हें क्या दूँ?' ।। १२ ।।
क्रमशः...
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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