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#ॐ नमः शिवाय
हिमालय की बर्फ से ढकी चोटियों के बीच, जहां हर दिशा में "ॐ नमः शिवाय" की ध्वनि गूंजती थी, वहीं कैलाश पर्वत पर भगवान शिव समाधि में लीन रहते थे। संसार के पालन-पोषण, संहार और कल्याण का भार अपने कंधों पर उठाने वाले महादेव वैराग्य की प्रतिमूर्ति थे। उनके लिए राजमहल, वैभव और ऐश्वर्य का कोई महत्व नहीं था। वे भस्म को आभूषण, सर्पों को हार और व्याघ्रचर्म को वस्त्र बनाकर आनंदपूर्वक निवास करते थे।
उधर हिमालयराज और रानी मैना के महल में एक दिव्य कन्या ने जन्म लिया। उसका नाम रखा गया—पार्वती। बचपन से ही पार्वती का मन भगवान शिव की भक्ति में डूबा रहता था। ऋषि-मुनि जब भी कैलाश के स्वामी की महिमा सुनाते, पार्वती का हृदय आनंद से भर उठता। धीरे-धीरे उनके मन में एक ही संकल्प जन्म लेने लगा—"मैं केवल भगवान शिव को ही अपना पति बनाऊंगी।"
एक दिन देवर्षि नारद हिमालय के महल पहुंचे। उन्होंने पार्वती का भविष्य देखकर कहा, "राजकुमारी, तुम्हारा विवाह स्वयं भगवान शिव से होगा। लेकिन इसके लिए तुम्हें कठोर तपस्या करनी होगी।" यह सुनकर पार्वती ने उसी क्षण निश्चय कर लिया कि चाहे कितनी भी कठिनाई आए, वे अपने संकल्प से पीछे नहीं हटेंगी।
समय बीतता गया। पार्वती वन में चली गईं और घोर तपस्या आरंभ कर दी। पहले उन्होंने केवल फल खाए, फिर पत्तों का त्याग कर दिया। अंत में वे केवल वायु के सहारे वर्षों तक तप करती रहीं। उनकी तपस्या इतनी प्रचंड थी कि तीनों लोकों में उसका प्रभाव दिखाई देने लगा। देवता भी आश्चर्यचकित हो उठे कि इतनी कठोर साधना आज तक किसी ने नहीं की थी।
इसी बीच तारकासुर नामक राक्षस ने तीनों लोकों में आतंक मचा दिया। उसे वरदान प्राप्त था कि उसका वध केवल भगवान शिव के पुत्र के हाथों ही हो सकता है। लेकिन भगवान शिव तो समाधि में लीन थे और विवाह का कोई विचार भी नहीं करते थे। देवताओं ने समझ लिया कि अब शिव और पार्वती का मिलन ही संसार की रक्षा का एकमात्र उपाय है।
देवताओं ने कामदेव को शिव की समाधि भंग करने के लिए भेजा। जैसे ही कामदेव ने अपना पुष्पबाण चलाया, भगवान शिव ने क्रोधित होकर अपना तीसरा नेत्र खोल दिया। उसकी अग्नि से कामदेव तत्काल भस्म हो गए। पूरा वातावरण कांप उठा। देवता भयभीत हो गए, लेकिन पार्वती अपने संकल्प से तनिक भी विचलित नहीं हुईं। वे पहले की तरह भगवान शिव की आराधना करती रहीं।
भगवान शिव ने पार्वती की भक्ति की परीक्षा लेने का निश्चय किया। वे एक वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण करके उनके पास पहुंचे और बोले, "पुत्री, तुम किसके लिए इतनी कठोर तपस्या कर रही हो?" पार्वती ने उत्तर दिया, "मैं भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करना चाहती हूं।"
वृद्ध ब्राह्मण मुस्कुराकर बोले, "शिव? वही जो भस्म लगाते हैं, जिनके गले में सांप हैं, जो श्मशान में रहते हैं? ऐसे विरक्त योगी से विवाह कर तुम क्या सुख पाओगी? किसी राजकुमार को अपना वर बना लो।"
यह सुनते ही पार्वती ने दृढ़ स्वर में कहा, "आप भगवान शिव का वास्तविक स्वरूप नहीं जानते। वे केवल योगी नहीं, स्वयं महादेव हैं। वे दयालु हैं, करुणामय हैं और समस्त ब्रह्मांड के स्वामी हैं। मैं उनसे बढ़कर किसी को नहीं मानती। यदि जीवन भर तपस्या करनी पड़े, तब भी मैं केवल उन्हीं को अपना पति स्वीकार करूंगी।"
पार्वती के अटूट प्रेम और अडिग विश्वास को देखकर भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न हुए। उसी क्षण उन्होंने अपना वास्तविक दिव्य स्वरूप प्रकट कर दिया। उनके मस्तक पर अर्धचंद्र, जटाओं में बहती गंगा, गले में नाग और शरीर पर भस्म की दिव्य आभा देखकर पार्वती भावविभोर हो गईं। भगवान शिव मुस्कुराकर बोले, "देवी, तुम्हारी तपस्या, तुम्हारा प्रेम और तुम्हारी भक्ति ने मुझे प्रसन्न कर दिया है। आज से मैं तुम्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार करता हूं।"
यह समाचार सुनकर हिमालयराज के महल में उत्सव प्रारंभ हो गया। देवता, ऋषि, गंधर्व, यक्ष और सिद्ध सभी उस दिव्य विवाह के साक्षी बनने पहुंचे। भगवान शिव अपनी अनोखी बारात लेकर आए। बारात में भूत, प्रेत, गण, योगी, नाग और नंदी भी सम्मिलित थे। यह विचित्र बारात देखकर रानी मैना पहले तो घबरा गईं, लेकिन जब भगवान शिव ने अपना मनोहर रूप धारण किया, तब उनका हृदय आनंद से भर उठा।
वैदिक मंत्रों के बीच भगवान शिव और माता पार्वती का दिव्य विवाह संपन्न हुआ। आकाश से देवताओं ने पुष्पवर्षा की। चारों दिशाओं में "हर-हर महादेव" और "जय माता पार्वती" के जयघोष गूंज उठे। उस दिन केवल दो आत्माओं का नहीं, बल्कि शक्ति और शिव का दिव्य मिलन हुआ। इसी मिलन से आगे चलकर भगवान कार्तिकेय का जन्म हुआ, जिन्होंने तारकासुर का वध करके देवताओं को भयमुक्त किया।
यह पावन कथा हमें सिखाती है कि सच्चा प्रेम बाहरी रूप, धन और वैभव नहीं देखता। सच्चा प्रेम विश्वास, समर्पण और त्याग पर आधारित होता है। माता पार्वती की अटूट भक्ति और भगवान शिव की करुणा हमें यह संदेश देती है कि जो अपने लक्ष्य के प्रति पूरी निष्ठा और धैर्य रखता है, उसे अंततः सफलता अवश्य प्राप्त होती है। हर हर महादेव! 🙏