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. समर्थ पनमेश्वर कबीर
श्री ब्रह्मा जी रजगुण हैं, श्री विष्णु जी सतगुण हैं तथा श्री शिव जी तमगुण हैं। यह तीनों प्रभु नाशवान हैं तथा इनका जन्म-मृत्यु होता है यही प्रमाण गीता अध्याय 14 श्लोक 3 से 5 में है। गीता ज्ञान दाता काल भगवान अथार्त ज्योतनिरंजन अथार्त ब्रह्म कह रहा है कि प्रकृति दुर्गा तो मेरी पत्नी है। मैं उसकी योनि अथार्त गर्भ स्थान में बीज स्थापना करता हूं जिससे सब प्राणियों की उत्पत्ति होती है। मैं सर्व 21 ब्रह्मांड के प्राणियों का पिता हूं तथा प्रकृति दुर्गा सबकी माता है। इसी दुर्गा से उत्पन्न तीनों गुण अन्य प्राणियों को कर्मों के बंधन में बांधते हैं।
गीता ज्ञान दाता काल कहता है कि मैं केवल 21 ब्रह्मांड में ही मालिक हूँ। इसलिए तीनों गुणों से जो कुछ भी हो रहा है उसका मुख्य कारण मैं काल, ब्रह्म ही हूं क्योंकि काल को एक लाख मानव शरीर धारी प्राणियों के शरीर को मारकर मैल को खाने का शाप लगा है जो साधक मेरी साधना करके त्रिगुण माया की साधना करते हैं क्षणिक लाभ प्राप्त करते हैं जिससे ज्यादा कष्ट उठाते रहते हैं।
गीता अध्याय 2 श्लोक 46 में कहा है कि अर्जुन! बहुत बड़े जलाशय की (जिसका जल 10 वर्ष भी वर्षा ना हो तो समाप्त नहीं होता) प्राप्ति के पश्चात छोटे जलाशय (जिसका जल एक वर्षा न होने से ही समाप्त हो जाता है) में जैसी आस्था रह जाती है उसी प्रकार पूर्ण परमात्मा से मिलने वाले लाभ के ज्ञान से परिचित होने के पश्चात तेरी आस्था अन्य प्रभु में वैसी ही रह जाएगी। छोटा जलाशय बुरा नहीं लगता परंतु उस की क्षमता का पता है कि यह तो कामचलाऊ है। पूर्ण परमात्मा तो बड़ा जलाशय जानो और ब्रह्मा, विष्णु,महेश छोटे जलाशय ।
गीता ज्ञान दाता अपनी साधना को भी घटिया बता रहा है। गीता अध्याय 15 श्लोक 4 तथा अध्याय 18 श्लोक 62 में कहा है कि उस परमेश्वर की शरण में जा जिसकी कृपा से तू परम शांति को तथा सतलोक शाश्वत स्थान को प्राप्त होगा वहां जाने के बाद साधक का पुनर्जन्म नहीं होता गीता ज्ञान दाता भी उसी आदि पुरुष परमेश्वर की शरण में है।
इससे स्पष्ट है की ब्रह्मा, विष्णु, महेश नाशवान हैं तथा उनकी मुक्ति से मोक्ष संभव नहीं है। कबीर परमेश्वर अविनाशी हैं जिनकी भक्ति से ही पूर्ण मोक्ष संभव है गीता दाता ज्ञान दाता काल ब्रह्म भी उन्हीं की शरण में है।
महाभारत के युद्ध में पांडवों की तरफ से अभिमन्यु मुख्य युवा योद्धा थे। चक्रव्यूह में उनकी मृत्यु के बाद सभी को उम्मीद थी कि भगवान श्रीकृष्ण उन्हें जिंदा कर देंगे लेकिन वह अपने भांजे को जीवित नहीं कर पाए क्योंकि उनका जीवन शेष नहीं था। वही पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब ने ऐसी असंख्य लीलाएं की जिनमें उन्होंने मृत लोगों को भी जीवित किया।
कमाल नाम का बालक जो मृत्यु के उपरान्त जल प्रवाह कर दिया था, उसको जीवित किया । शेखतकी की लड़की जिसे मृत्यु के उपरांत कब्र में दफना दिया था, उसे कब्र से निकालकर जिंदा किया और उसका नाम कमाली रखा और भी ऐसे कई चमत्कार कबीर परमात्मा ने किये, जिससे सिद्ध होता है कि वही पूर्ण परमात्मा हैं।
अमर /अविनाशी भगवान कौन है ?
परम अक्षर ब्रह्म/ परमेश्वर/ सतपुरुष/ कविर्देव/ कबीर) परम् अक्षर ब्रह्म कविर्देव अमर और अविनाशी परमात्मा हैं। सर्वोच्च सत्ता के स्वामी कविर्देव सदा से विद्यमान हैं। परमेश्वर कविर्देव की जन्म मृत्यु नहीं होती। गीता अध्याय 15 श्लोक 16-17 तथा अध्याय 8 श्लोक 20 से 22 में गीता ज्ञान दाता ने परम अक्षर ब्रह्म, अविनाशी परमात्मा के बारे में कहा है।
श्रीमद्देवी भागवत (गीताप्रेस गोरखपुर), तृतीय स्कंद, पृष्ठ 114 -115 मे स्पष्टीकरण मिलता है कि ब्रह्म (काल/क्षर पुरूष) माँ दुर्गा (प्रकृति देवी/आदिमाया/अष्टांगी/शेरांवाली) के पति हैं।
चाहे कितनी भी अधिक आयु क्यों न हो अंततः पूर्ण अविनाशी परमेश्वर के अतिरिक्त सभी देवता भी मरेंगे। यदि सतगुरु से भेंट हो जाये तो सतलोक पहुँचेंगे जो अमर स्थान है जहां जन्म-मृत्यु नहीं होती है। आइए जानें सभी प्रभुओं की आयु कितनी है। सबसे पहले चारों युगों की आयु जान लें जो कि निम्न प्रकार है:
सतयुग की आयु=1728000 (17 लाख 28 हजार) वर्ष
द्वापरयुग की आयु=1296000 (12 लाख 96 हज़ार) वर्ष
त्रेता युग की आयु=864000 (8 लाख 64 हज़ार) वर्ष
कलयुग की आयु = 432000 (4 लाख 32 हज़ार) वर्ष
इस तरह एक चतुर्युग में = 4320000 (43 लाख 20 हजार) वर्ष होते हैं।
सभी देवताओं की आयु v/s पूर्ण परमात्मा
इंद्र- 72 चतुर्युग या 1 मन्वन्तर
शची- 1008 चतुर्युग या एक कल्प (इतने समय मे 14 इन्द्रों का जीवन समाप्त हो जाता है )
ब्रह्मा जी –72000000 (सात करोड़ बीस लाख) चतुर्युग
विष्णु जी- 504000000 (पचास करोड़ चालीस लाख) चतुर्युग
शिवजी- 3528000000 (तीन अरब बावन करोड़ अस्सी लाख) चतुर्युग
क्षर पुरुष/ काल ब्रह्म काल- 70 हजार शिव जी के बराबर आयु
परब्रह्म – काल के एक जीवन के बराबर एक युग और ऐसे हजार युगों का एक दिन बनता है परब्रह्म का। ऐसे
दिनों से बने 100 वर्षों की आयु परब्रह्म की होती है।
पूर्णब्रह्म कविर्देव- अमर अविनाशी जिसकी कभी मृत्यु नहीं होती।
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