#जय श्री कृष्ण
श्रीकृष्ण का सान्निध्य चाहिए,
तो उनसे सम्बन्ध जोड़ना होगा::
संसार में किसी भी व्यक्ति का सान्निध्य तभी प्राप्त होता है जब उससे कोई सम्बन्ध हो। जहाँ सम्बन्ध नहीं, वहाँ निकटता भी नहीं। यही नियम भगवान के साथ भी लागू होता है। श्रीकृष्ण सर्वत्र व्याप्त हैं, सबके हृदय में विराजमान हैं, किन्तु उनके प्रेममय सान्निध्य का अनुभव वही कर पाता है जो उनसे अपना सम्बन्ध स्थापित करता है।
भगवान को केवल पूजनीय देवता मानना एक बात है, किन्तु उन्हें अपना मान लेना दूसरी बात है। जब भक्त कहता है— "हे कृष्ण! आप मेरे हैं और मैं आपका हूँ" — तभी भक्ति का वास्तविक आरम्भ होता है।
त्वमेव माता च पिता त्वमेव।
त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव॥
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव।
त्वमेव सर्वं मम देवदेव॥
जब भक्त इस भाव को धारण करता है, तब श्रीकृष्ण उसके जीवन के प्रत्येक क्षण में उपस्थित होने लगते हैं।
श्रीमद्भागवत का सिद्धान्त
श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्।
अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम्॥
इन नौ प्रकार की भक्ति के माध्यम से जीव भगवान से सम्बन्ध स्थापित करता है। कोई उन्हें स्वामी मानकर दास्य भाव करता है, कोई मित्र मानकर सख्य भाव करता है, कोई पुत्र मानकर वात्सल्य भाव करता है और कोई उन्हें अपना सर्वस्व मानकर आत्मसमर्पण करता है।
गीता का संदेश::
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥
अपने मन को मुझमें लगाओ, मेरे भक्त बनो, मेरी पूजा करो और मुझे प्रणाम करो। ऐसा करने पर तुम निश्चित रूप से मुझे प्राप्त करोगे।
भगवान श्रीकृष्ण किसी बाहरी वैभव से प्रसन्न नहीं होते, वे सम्बन्ध और प्रेम से बंधते हैं। वृन्दावन की गोपियाँ, नन्द बाबा, यशोदा मैया, सुदामा और अर्जुन—इन सबने कृष्ण को अपने जीवन का अंग बना लिया था। इसलिए उन्हें केवल भगवान नहीं, बल्कि अपने प्रियतम, पुत्र, मित्र और स्वामी के रूप में अनुभव किया।
यदि कृष्ण का सान्निध्य चाहिए तो केवल मन्दिर जाना पर्याप्त नहीं, हृदय को भी उनका निवास बनाना होगा।
यदि कृष्ण का प्रेम चाहिए तो केवल नाम जपना पर्याप्त नहीं, अपने जीवन को भी उनके चरणों में अर्पित करना होगा।
यदि कृष्ण को पाना है तो उनसे रिश्ता जोड़ना होगा— कभी मित्र बनकर, कभी सेवक बनकर, कभी पुत्र बनकर, और अन्ततः पूर्ण समर्पित भक्त बनकर।
कृष्णो मे जीवनं नित्यं कृष्णो मे हृदि संस्थितः।
कृष्णो मे बान्धवः साक्षात् कृष्णो मे परमं धनम्॥
यदा कृष्णे मनो लग्नं यदा कृष्णे दृढा मतिः।
तदा संसारबन्धेभ्यो मुक्तो भवति मानवः॥
श्रीकृष्ण का सान्निध्य पाने का रहस्य उन्हें ढूँढने में नहीं, उनसे अपना सम्बन्ध जोड़ने में है।
जिस दिन हृदय से यह भाव जाग जाएगा कि—
"कृष्ण मेरे हैं, और मैं कृष्ण का हूँ"
उसी दिन से जीवन में कृष्ण की उपस्थिति, कृपा और प्रेम का अनुभव होने लगेगा।
"नाथ! सम्बन्धं मया सार्धं कुरु कृष्ण दयानिधे।
त्वद्भक्तिरस्तु मे नित्यं जन्मजन्मान्तरेष्वपि॥"
हे दयामय कृष्ण! मुझसे अपना सम्बन्ध जोड़ लीजिए। जन्म-जन्मान्तर तक आपके चरणों में मेरी भक्ति बनी रहे।
राधे राधे.
जय श्रीकृष्ण.
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