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#💐शुभ गुरुवार 💐 जय 🌄श्री हरि विष्णु भगवान🌻ऊं साई राम🌻 गुड मॉर्निंग 🌺 शुभकामना संदेश 💐🌻 #जय श्री हरि
आज भी केरल के तिरुवनंतपुरम में स्थित श्री पद्मनाभ स्वामी मंदिर को लेकर एक ऐसी अद्भुत मान्यता सुनाई जाती है, जिसे जानकर भक्तों के मन में भगवान विष्णु के प्रति श्रद्धा और भी गहरी हो जाती है। कहा जाता है कि यहां गर्भगृह में विराजमान भगवान विष्णु का दिव्य स्वरूप इतना विशाल है कि भक्त एक ही स्थान से उनके संपूर्ण दर्शन नहीं कर सकते। भगवान के मुख, नाभि और चरणों के दर्शन के लिए तीन अलग-अलग द्वारों का सहारा लेना पड़ता है। लेकिन सबसे रहस्यमय बात यह है कि इस विशाल स्वरूप को किसी साधारण मूर्तिकार की बनाई हुई प्रतिमा नहीं, बल्कि भगवान का स्वयंभू और दिव्य स्वरूप माना जाता है। आखिर भगवान विष्णु ने अपने एक वृद्ध भक्त के लिए इतना विराट रूप क्यों धारण किया और तीन अलग-अलग द्वारों से दर्शन की यह परंपरा कैसे शुरू हुई, इसके पीछे एक बेहद भावपूर्ण कथा सुनाई जाती है।
कहा जाता है कि बहुत समय पहले विल्व मंगलम स्वामियार नाम के भगवान विष्णु के एक महान भक्त हुआ करते थे। उनका जीवन पूरी तरह भगवान की भक्ति और साधना में समर्पित था। उम्र बढ़ती गई और शरीर कमजोर होता गया, लेकिन भगवान के प्रति उनका प्रेम और विश्वास कभी कम नहीं हुआ। वे दिन-रात अपने आराध्य का स्मरण करते और मन ही मन यही इच्छा रखते कि जीवन के अंतिम समय में उन्हें भगवान विष्णु के साक्षात दर्शन प्राप्त हो जाएं। उनकी इसी अटूट भक्ति को देखकर भगवान विष्णु ने अपने प्रिय भक्त पर विशेष कृपा करने का निश्चय किया। प्रभु ने सोचा कि इस भक्त के प्रेम को केवल दूर से देखना पर्याप्त नहीं है, बल्कि स्वयं उसके पास जाकर उसकी भक्ति का आनंद लेना चाहिए।
एक दिन भगवान विष्णु ने एक छोटे, मासूम और बेहद चंचल बालक का रूप धारण किया और विल्व मंगलम स्वामियार के पास पहुंच गए। बालक के चेहरे पर ऐसी मासूम मुस्कान थी कि वृद्ध स्वामी का मन तुरंत उसकी ओर आकर्षित हो गया। बालक ने बड़ी सरलता से कहा कि वह उनकी पूजा में सहायता करना चाहता है। वह उनके लिए फूल लाएगा, पूजा की सामग्री सजाएगा और उनके छोटे-बड़े कामों में हाथ बंटाएगा। लेकिन उसने एक शर्त भी रखी कि स्वामी उसे कभी डांटेंगे नहीं। वृद्ध भक्त ने बालक की बात स्वीकार कर ली। उन्हें क्या पता था कि उनके सामने खड़ा यह साधारण सा बालक कोई और नहीं, बल्कि स्वयं उनके आराध्य भगवान विष्णु थे।
इसके बाद भगवान की अद्भुत लीला शुरू हुई। वह बालक कभी पूजा के फूलों से खेलने लगता, कभी स्वामी की साधना के बीच शरारत करता और कभी उनके ध्यान में बैठते ही उन्हें हंसाने की कोशिश करता। वृद्ध स्वामी पहले तो उसकी शरारतों को मुस्कुराकर सहन करते रहे, क्योंकि उन्हें बालक से विशेष स्नेह हो गया था। लेकिन धीरे-धीरे बालक की चंचलता बढ़ती गई। एक दिन जब स्वामी गहरी साधना में बैठे थे, तब बालक ने फिर उनकी साधना भंग कर दी। बार-बार ध्यान टूटने से वृद्ध स्वामी स्वयं को रोक नहीं पाए और क्रोध में उन्होंने उस बालक को कठोर शब्द कह दिए। जैसे ही उनके मुख से वे शब्द निकले, बालक उसी क्षण वहां से गायब हो गया।
बालक के अचानक गायब होते ही स्वामी को अपनी भूल का एहसास हुआ। वे व्याकुल होकर उसे चारों ओर खोजने लगे। तभी उन्हें एक दिव्य संकेत मिला कि यदि वे अपने प्रभु के दर्शन करना चाहते हैं तो उन्हें जंगल की ओर जाना होगा। वृद्ध भक्त समझ गए कि जिस बालक को उन्होंने साधारण समझकर डांट दिया था, उसके पीछे कोई गहरा रहस्य अवश्य है। उनकी आंखों से आंसू निकल आए। उन्होंने मन ही मन भगवान से क्षमा मांगी और बिना देर किए घने जंगल की ओर निकल पड़े। उम्र अधिक थी, शरीर कमजोर था, रास्ता कठिन था, लेकिन भक्ति के आगे कोई कठिनाई बड़ी नहीं लग रही थी।
कहा जाता है कि वे कई दिनों तक जंगल में अपने प्रभु की खोज करते रहे। न भोजन की चिंता थी, न पानी की और न ही अपने शरीर की। उनके मन में केवल एक ही इच्छा थी कि किसी भी तरह उस दिव्य बालक को फिर से देख सकें। तीसरे दिन उनकी दृष्टि एक विशाल वृक्ष के पास पहुंची, जहां उन्हें वही बालक दिखाई दिया। वृद्ध स्वामी उसे देखकर आनंद से भर उठे और उसकी ओर बढ़ने लगे। लेकिन जैसे ही वे उसके पास पहुंचने वाले थे, वह बालक अचानक उसी विशाल वृक्ष के भीतर समा गया। स्वामी कुछ समझ पाते, उससे पहले ही पूरा वातावरण दिव्य ऊर्जा से भर उठा और देखते ही देखते वह विशाल वृक्ष अद्भुत तरीके से फट गया।
वृक्ष के भीतर से जो स्वरूप प्रकट हुआ, उसे देखकर वृद्ध स्वामी की आंखें आश्चर्य से खुली रह गईं। उनके सामने स्वयं भगवान विष्णु का विराट स्वरूप प्रकट हो चुका था। प्रभु अनंत शेषनाग पर विराजमान थे और उनका दिव्य स्वरूप इतना विशाल था कि वृद्ध भक्त के लिए उसे एक ही दृष्टि में देख पाना संभव नहीं था। चारों ओर मानो दिव्य प्रकाश फैल गया था। स्वामी की आंखों से प्रेम के आंसू बहने लगे। जिस भगवान के दर्शन के लिए उन्होंने वर्षों तक भक्ति की थी, आज वही भगवान उनके सामने साक्षात खड़े थे। लेकिन प्रभु का विराट स्वरूप इतना विशाल था कि उनके लिए संपूर्ण रूप को एक साथ देखना कठिन हो गया।
वृद्ध भक्त ने हाथ जोड़कर भगवान से विनम्र प्रार्थना की कि प्रभु, मेरी आंखें आपके इस अनंत स्वरूप का पूर्ण दर्शन करने में समर्थ नहीं हैं। मैं आपके मुख का दर्शन करूं तो आपके चरण मेरी दृष्टि से दूर हो जाते हैं और चरणों को देखूं तो आपका मुख दिखाई नहीं देता। कृपा करके अपने इस विराट स्वरूप को मेरे लिए छोटा कर दीजिए, ताकि मैं अपने आराध्य के संपूर्ण स्वरूप का दर्शन कर सकूं। अपने भक्त की यह करुण पुकार सुनकर भगवान विष्णु प्रसन्न हुए और उन्होंने अपना विराट स्वरूप छोटा कर लिया। लेकिन भगवान का स्वरूप फिर भी इतना विशाल रहा कि भक्त एक ही स्थान से उनका संपूर्ण दर्शन नहीं कर सकता था।
कहा जाता है कि इसी दिव्य स्वरूप की स्मृति से आगे चलकर तिरुवनंतपुरम में श्री पद्मनाभ स्वामी मंदिर की महान परंपरा जुड़ी। मंदिर के गर्भगृह में भगवान विष्णु अनंत शेषनाग पर शयन मुद्रा में विराजमान माने जाते हैं और भक्तों को उनके दर्शन तीन अलग-अलग द्वारों से करने पड़ते हैं। पहले द्वार से भगवान के दिव्य मुख और ऊपरी स्वरूप के दर्शन होते हैं, दूसरे द्वार से उनके नाभि प्रदेश के दर्शन किए जाते हैं, जहां से कमल पर विराजमान ब्रह्मा का दर्शन माना जाता है, और तीसरे द्वार से भगवान के चरणों के दर्शन होते हैं। इस प्रकार भक्त तीनों द्वारों से भगवान के विराट स्वरूप को अलग-अलग भागों में निहारते हैं।
इस कथा का सबसे सुंदर संदेश यही है कि भगवान अपने भक्त की भावना के सामने स्वयं को सीमित करने में भी संकोच नहीं करते। जिस प्रभु का स्वरूप अनंत है, जो पूरे ब्रह्मांड में व्याप्त हैं, वही अपने भक्त की छोटी सी प्रार्थना पर अपना विराट रूप छोटा कर लेते हैं। विल्व मंगलम स्वामियार ने भगवान से धन, राज्य या सांसारिक सुख नहीं मांगा था। उन्होंने केवल अपने आराध्य के दर्शन मांगे थे और उनकी इसी निष्कलुष भक्ति ने भगवान को उनके सामने प्रकट होने के लिए विवश कर दिया। इसलिए भक्तों के लिए यह कथा केवल एक मंदिर की रहस्यमयी कहानी नहीं, बल्कि भक्ति और भगवान के बीच के उस अद्भुत संबंध का प्रतीक है, जहां सच्चे प्रेम के सामने स्वयं भगवान भी अपने भक्त के अनुरूप हो जाते हैं। आज भी जब भक्त श्री पद्मनाभ स्वामी के गर्भगृह में उन तीनों द्वारों से दर्शन करते हैं, तो उनके मन में यही भावना होती है कि वे केवल एक प्रतिमा के नहीं, बल्कि उस अनंत भगवान के दर्शन कर रहे हैं, जिनके विराट स्वरूप को देखने के लिए स्वयं एक भक्त ने कभी प्रेम से प्रार्थना की थी। यही कारण है कि श्री पद्मनाभ स्वामी मंदिर की यह परंपरा आज भी श्रद्धालुओं के लिए रहस्य, आस्था और भक्ति का अद्भुत संगम बनी हुई है।