#🇮🇳गर्व से कहो हम हिन्दू हैं🇮🇳 #जब श्रीकृष्ण-प्रेम जाग्रत होता है, तब संसार साधन बन जाता है और साध्य केवल श्रीकृष्ण रहते हैं; किन्तु जब प्रेम का अभाव होता है, तब यही संसार साध्य बन जाता है और श्रीकृष्ण केवल एक साधन बनकर रह जाते हैं। मनुष्य के जीवन की दिशा उसके प्रेम से निर्धारित होती है। वह जिससे प्रेम करता है, उसी के लिए जीता है, उसी के लिए सोचता है, उसी के लिए संघर्ष करता है और अंततः उसी की प्राप्ति को अपने जीवन का लक्ष्य बना लेता है। यही कारण है कि शास्त्रों ने बार-बार कहा है कि जीवन का वास्तविक प्रश्न यह नहीं है कि हम क्या कर रहे हैं, बल्कि यह है कि हम किसके लिए कर रहे हैं। यदि हृदय में श्रीकृष्ण के प्रति निष्काम, निर्मल और अनन्य प्रेम जागृत हो जाए, तो वही संसार, जो पहले बंधन प्रतीत होता था, भगवान की सेवा का माध्यम बन जाता है। परिवार सेवा का क्षेत्र बन जाता है, धन धर्म का साधन बन जाता है, विद्या भगवान की महिमा के प्रचार का माध्यम बन जाती है, शरीर भजन का उपकरण बन जाता है और प्रत्येक श्वास हरिनाम का अवसर बन जाती है। किन्तु जब श्रीकृष्ण-प्रेम का अभाव होता है, तब यही स्थिति उलट जाती है। तब मनुष्य धन इसलिए चाहता है कि अधिक सुख मिले, पूजा इसलिए करता है कि व्यापार बढ़े, जप इसलिए करता है कि रोग दूर हो जाए, व्रत इसलिए करता है कि इच्छाएँ पूर्ण हो जाएँ। तब भगवान लक्ष्य नहीं रहते, बल्कि इच्छाओं की पूर्ति का माध्यम बन जाते हैं। संसार साध्य बन जाता है और श्रीकृष्ण केवल साधन। भगवद्गीता में भगवान स्वयं कहते हैं— अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते। तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥ (गीता 9.22) जो भक्त केवल मेरा ही चिंतन और उपासना करते हैं, उनके योग-क्षेम का भार मैं स्वयं वहन करता हूँ। यहाँ भगवान ने स्पष्ट किया कि जो उन्हें साध्य बना लेते हैं, उनके लिए संसार की व्यवस्था भी भगवान स्वयं कर देते हैं। अर्थात् संसार पीछे चलता है और भगवान आगे रहते हैं। श्रीमद्भागवत में भी कहा गया है— स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे। अहैतुकीऽप्रतिहता ययाऽत्मा सुप्रसीदति॥ मनुष्य का सर्वोच्च धर्म वही है जिससे भगवान में निष्काम, निरन्तर और अहैतुकी भक्ति उत्पन्न हो। ध्यान दीजिए—यहाँ कहीं भी धन, यश, पद या स्वर्ग को जीवन का लक्ष्य नहीं कहा गया; लक्ष्य केवल भगवान की प्रेममयी भक्ति है। श्रीकृष्ण कहते हैं— मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु। मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥ अर्थात् अपना मन मुझे दे दो, मेरे भक्त बनो, मेरी पूजा करो, मुझे प्रणाम करो—तुम निश्चित ही मुझे प्राप्त हो जाओगे। यही भक्ति का सार है। जब मनुष्य का मन श्रीकृष्ण में स्थित हो जाता है, तब संसार का प्रत्येक कार्य भी भगवान की ओर ले जाने वाला मार्ग बन जाता है। गोपियों का आदर्श वृन्दावन की गोपियाँ इसका सर्वोच्च उदाहरण हैं। उन्होंने श्रीकृष्ण से कभी धन, वैभव, राज्य या स्वर्ग नहीं माँगा। उनका एकमात्र लक्ष्य था—श्रीकृष्ण का सान्निध्य। इसीलिए श्रीमद्भागवत में वर्णित है कि उनका प्रेम इतना निर्मल था कि भगवान स्वयं उनके प्रेम के ऋणी हो गए। गोपियों ने कृष्ण का उपयोग अपने सुख के लिए नहीं किया, बल्कि स्वयं को कृष्ण के सुख के लिए समर्पित कर दिया। सुदामा का आदर्श सुदामा श्रीकृष्ण के पास धन माँगने नहीं गए थे। वे केवल अपने प्रिय सखा के दर्शन के लिए गए थे। उन्होंने कुछ नहीं माँगा, परन्तु श्रीकृष्ण ने बिना माँगे सब कुछ दे दिया। क्योंकि जहाँ भगवान साध्य होते हैं, वहाँ संसार स्वयं पीछे-पीछे आता है। ध्रुव का परिवर्तन ध्रुव प्रारम्भ में राज्य पाने के लिए भगवान की आराधना करने गए थे। उस समय भगवान उनके लिए साधन थे और राज्य साध्य। किन्तु जब भगवान के दर्शन हुए, तब उन्होंने कहा— स्वामिन् कृतार्थोऽस्मि वरं न याचे। हे प्रभु! अब मैं पूर्णतः कृतार्थ हूँ; मुझे कोई वरदान नहीं चाहिए। यही वह क्षण था जब साध्य बदल गया। अब राज्य नहीं, केवल भगवान ही उनके जीवन का लक्ष्य रह गए। प्रह्लाद की भक्ति हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद से पूछा—तुम्हें भगवान से क्या चाहिए? प्रह्लाद ने उत्तर दिया कि जो भगवान की भक्ति किसी फल की अपेक्षा से करता है, वह व्यापारी है, भक्त नहीं। यह कथन भक्ति का शिखर है। यदि कोई व्यक्ति दीपक केवल इसलिए जलाता है कि उसे धन मिल जाए, तो दीपक भगवान के लिए नहीं, धन के लिए जलाया गया। यदि कोई जप केवल रोग दूर करने के लिए करता है, तो जप भगवान के लिए नहीं, स्वास्थ्य के लिए है। यदि कोई मंदिर केवल मनोकामना पूर्ण कराने के लिए जाता है, तो उसके लिए भगवान साधन हैं, साध्य नहीं। किन्तु यदि कोई कहे— "प्रभु! मुझे कुछ नहीं चाहिए। यदि आप प्रसन्न हैं, तो वही मेरे जीवन का सबसे बड़ा धन है।" तभी वास्तविक प्रेम प्रारम्भ होता है। प्रेम की पहचान प्रेम लेने का नाम नहीं, स्वयं को अर्पित करने का नाम है। प्रेम अधिकार नहीं माँगता, समर्पण सिखाता है। प्रेम सौदेबाज़ी नहीं करता, सम्पूर्ण आत्मसमर्पण करता है। प्रेम में भगवान से वस्तुएँ नहीं माँगी जातीं; स्वयं भगवान को माँगा जाता है। इसीलिए श्रीकृष्ण कहते हैं— पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति। तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥ भगवान वस्तु का मूल्य नहीं देखते, वे उसमें छिपा प्रेम देखते हैं। जब श्रीकृष्ण जीवन का लक्ष्य बन जाते हैं, तब संसार का प्रत्येक संबंध, प्रत्येक कर्म, प्रत्येक उपलब्धि और प्रत्येक परिस्थिति भगवान की ओर ले जाने वाला साधन बन जाती है। किन्तु जब संसार ही लक्ष्य बन जाता है, तब भगवान भी इच्छाओं की पूर्ति का माध्यम बनकर रह जाते हैं। इसलिए भक्त का संकल्प यही होना चाहिए— "हे नन्दनन्दन! मुझे आपका प्रेम दे दीजिए। यदि आपका प्रेम मिल गया, तो समस्त संसार अपने आप उचित स्थान पर आ जाएगा। पर यदि आपका प्रेम नहीं मिला, तो संसार की सारी उपलब्धियाँ भी अंततः रिक्त ही रहेंगी।" अतः जीवन का सार यही है— संसार का उपयोग श्रीकृष्ण की प्राप्ति के लिए करो; श्रीकृष्ण का उपयोग संसार की प्राप्ति के लिए कभी मत करो। यही भक्ति का रहस्य है, यही गीता का संदेश है, यही श्रीमद्भागवत का निष्कर्ष है और यही संतों की वाणी का अमर सत्य है। ~श्री कृष्ण~ #krishnaconsciousness #krishna #nonfollowers #shrimadbhagwatkatha #sanatandharma #hinduism #babitasrivastava #viralphotochallenge
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