sn vyas
🙏🛐ॐ श्री परमात्मने नमः🛐🙏🙏
🙏कर्म का सिद्धांत पुस्तक से 🙏
#भाग_२४ ️
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🦚निष्काम कर्म🦚
*(6) कामना से रहित किए हुए कर्म संचित कर्म में जमा होते नहीं ,,, सच पूछिए तो आदमी जो कर्म करता है वह किसी न किसी कामना से, इच्छा से ,आशा से , ही प्रेरित होकर करता है । और उसमें उसका दोष नहीं । आदमी फल की आशा , इच्छा ,कामना , रखे या ना रखे , तो भी कर्म फल दिए बिना रहता नहीं । ऐसा कर्म का सिद्धांत है ।*
*जो हम लोग ऊपर देख चुके हैं , किंतु कुछ आदमी कर्म करते हैं , फिर भी उसको उस कर्म का फल चाहिए नहीं ,,, यह बात विचित्र नहीं ,,, किंतु सच है ।*
*आदमी पाप करता है, किंतु उसका फल उसको नहीं चाहिए ,आदमी चोरी करता है किंतु उस को पुलिस ने पकड़ा जाना पसंद नहीं ,,, उसको घूस लेनी है किंतु घूस लेते हुए उसको पकड़ा जाना नहीं ,,, और उसका फल दंड सजा उसको नहीं चाहिए ,,*
*इसका अर्थ ऐसा नहीं है कि निष्काम कर्म करता है ,,, आदमी को पाप कर्म करने की इच्छा होती है किंतु उसको उसका फल भोगने की थोड़ी भी इच्छा होती नहीं ,,, उसको तो केवल पुण्य कर्म के ही फल चाहिए ,,, किंतु पुण्य कर्म उसको करना नहीं।*
*पाप कर्म करने वालों को उसके फल की कामना नहीं है। इसलिए वह आदमी पाप कर्म,,, निष्काम कर्म भाव से करता है ऐसा नहीं है ।*
*निष्काम कर्म ,, शास्त्र विहित कर्म ,, धर्म की मर्यादा में रहकर,,, राग द्वेश से प्रेरित हुए बिना ,,, कर्तापन के अभिमान बिना ,,, समष्टि के कल्याण के लिए ,,, अपना निजी स्वार्थ छोड़कर ,,, किया हुआ कर्म ,,, वह निष्काम कर्म है ,,,,*
*भगवान आज्ञा करते हैं ---*
*मा कर्मफल हेतु भूर्:*
*फल मिले तब ही कर्म करेंगे, इस भावना से नहीं ,,, किंतु अपने कर्तव्य के अंग स्वरूप, अपना अंतर -आत्मा प्रसन्न हो जाए इसलिए ,, भगवद् प्रित्यर्थ आदमी कर्म करें ,, वही निष्काम कर्म है ।*
*आदमी सुबह उठता है तब से सुख की खोज में ही निकल पड़ता है , और केवल सुख प्राप्त करने के लिए ही कर्म करता है । कोई भी आदमी दुख की खोज में निकल कर दुख पाने के लिए कर्म नहीं करता। फिर भी दुख प्रारब्ध बस मांगो या ना मांगो तो भी आकर मिलते ही हैं ।*
*भक्त नरसी मेहता कहते हैं--*
*सुख-दुख मन में नहीं लाने चाहिए*
*वे तो देह के साथ ही पैदा होते हैं,*
*टालने से टलते नहीं,* *रघुनाथ के बनाए हुए है*
*किंतु निष्काम भाव से भगवत् प्रीत्यर्थ कर्म संचित में जमा नहीं होते और वे जीव को जन्म मरण के चक्कर में नहीं डालते ।*
*सूर्यनारायण उदय होते हैं, उसी समय अंधकार का नाश हो जाता है ,, किंतु हम लोग अगर सूर्यनारायण को कहेंगे कि हम आपका उपकार मानते हैं ,, कि आपने आकर गाढ अंधकार का नाश किया , तो सूर्य नारायण ऐसे ही जवाब देने कि ,,, मैंने अंधकार को देखा ही नहीं है ,,, मैंने अंधकार का नाश ही नहीं किया ,,, किंतु मेरे अस्तित्व मात्र से ही अंधकार अपने आप दूर हो गया है ,,,*
*और अगर मेरे सानिध्य में अंधकार खड़ा रहे ,, रुक सके तो मेरा अस्तित्व नहीं रहेगा। सूर्यनारायण तो केवल समष्टि के कल्याण के लिए जगत को प्रकाश और जीवन देने के लिए ,,, वह करोड़ों मील की सफर करते हैं । उस कार्य के लिए वह कुछ तनख्वाह मांगते नहीं । नियत समय से एक पल भी देर से उदय नहीं होते। केवल समष्टि के कल्याण के लिए कर्ता पन के अभिमान के बिना वह कर्म करते हैं ,,, इस कर्म को निष्काम कर्म कहते हैं।*
क्रमश: ✍🏽
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