sn vyas
🙏🙏🛐ॐ श्री परमात्मने नमः🛐🙏🙏
🙏कर्म का सिद्धांत पुस्तक से 🙏
#भाग05/01
संचित कर्म
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*किंतु कुछ क्रियमाण कर्म ऐसे होते हैं जो कर्म करने के साथ ही तत्काल फल नहीं देते। उस कर्म के फल को पकने में देर लगती है । तब तक वह अपरिपक्व रहता है और वह जब तक फल नहीं देता तब तक सिलक में जमा रहता है। उसको संचित कर्म कहते हैं।*
*उदाहरण के लिए आपने आज परीक्षा का पेपर लिखा-- महीने के बाद उसका परिणाम बाहर आएगा । आपने सुबह रेचक दवाई ली, चार घंटे के बाद दोपहर में आपका पेट साफ हो गया। आपने आज किसी को गाली दी-- दस दिन के बाद मौका पाकर वह आपको चपत मार जाएगा। आपने आपकी युवावस्था में अपने माता पिता को दुख दिया, आपको आपका बेटा आपकी वृद्धावस्था में दुख देगा ।*
*इस तरह कुछ क्रियमाण कर्म तत्कालीन फल नहीं देते, किंतु कुछ काल बीतने पर जब पक जाते हैं परिपक्व हो जाते हैं तब फल देते हैं । तब तक वह संचित कर्म में जमा पड़े रहते है ।*
*इस तरह अनादि काल से अनेक जन्मों के असंख्य संचित कर्मों के ढेर, असंख्य करोड़ों हिमालय पर्वत भर जाएं उतने संचित कर्मों के ढेर, जीव के पीछे जमा हुए पड़े हैं।*
*जीव अगर सावधानी से गंभीरतापूर्वक इसकी कल्पना करें तो वह कांप उठेगा, किन्तु अविद्या से ग्रस्त जीव इसकी कदाती कल्पना करता ही नहीं।*
*राजा दशरथ ने श्रवण का वध किया तब उसके विरह से मरते समय उसके माता-पिता ने राजा दशरथ को श्राप दिया, कि तेरी मृत्यु भी तेरे पुत्र के विरह से होगी,,,, किंतु राजा दशरथ का यह क्रियमाण कर्म तत्कालीन फल कैसे दे सकता है ? क्योंकि उस समय राजा को एक भी पुत्र की प्राप्ति नहीं हुई थी, इसलिए यह क्रियमाण कर्म फल देकर शांत नहीं हो सका, किंतु वह संचित कर्म में जमा हो गया।*
*समय बीतने पर जब राजा को एक के बदले चार पुत्र हुए, और बड़े हुए , सबकी शादी हो गई और जब श्री राम का राज्याभिषेक का दिन आया, उस समय वह संचित कर्म फल देने के लिए तत्पर हुआ। और ऐसे शुभ दिन पर भी दशरथ राजा को मृत्यु रूपी फल प्राप्त कराके ही शांत हुआ। उसमें घड़ी का भी विलंब चल नहीं सकता ,,,,*
*जो शुद्ध चैतन्य परात्पर ब्रह्म स्वयं सगुण साकार स्वरूप धारण कर पृथ्वी पर पधारे, वह राम जिनके चरण की रज के स्पर्श मात्र से शल्या की अहिल्या बन सकी, जिनके चरण रज के स्पर्श मात्र से पत्थर को जीवनदान मिल सका , वह परात्पर ब्रह्म भगवान श्री राम अगर अपने पिता की आयु केवल चौदह वर्ष के लिए भी बढ़ा सकते, तो उसमें कौन बाधा या विरोध डाल सकता था ? और क्या बाधा पड़ जाने वाली थी ?*
*लेकिन नहीं । कर्म के कानून का सख्त पालन करने में कोई भी सिफारिश चल ही नहीं सकती , इसलिए भगवान के घर अंधेर नहीं है ,,, इतना ही नहीं, देर भी नहीं है,,, ऐसा कर्म का अटल सिद्धांत है।*
क्रमशः संचित कर्म का दूसरा शेष भाग कल ✍️
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